भगवान श्रीकृष्ण को पूर्णावतार माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण की16 कलाएँ समाहित थीं, जिनमें करुणा, धैर्य, क्षमा, न्याय, निष्पक्षता, विरक्ति, ध्यान, सौंदर्य, दानशीलता और धर्म की स्थापना जैसे गुण शामिल हैं। आइए जानते हैं इन 16 कलाओं का विस्तृत अर्थ और महत्व।
करुणा:
करुणा का मतलब है दया का भाव, वो भावना जो दूसरों के दुख को अपना समझकर मदद करती है। श्री कृष्ण में ये गुण इतना गहरा था कि वे हमेशा जीवों की रक्षा करते थे, चाहे वो मनुष्य हों, जानवर या प्रकृति। महाभारत में द्रौपदी के चीरहरण की घटना याद करो, जब दुष्ट दुःशासन उसे अपमानित कर रहा था, तो द्रौपदी ने कृष्ण को पुकारा और उन्होंने करुणा से उसके वस्त्रों को अनंत कर दिया, उसे बचा लिया। ये दिखाता है कि करुणा कितनी शक्तिशाली होती है, क्योंकि कृष्ण ने द्रौपदी की भक्ति देखकर तुरंत मदद की। भागवत पुराण में भी, कृष्ण ने गोपियों के प्रेम में करुणा दिखाई, रासलीला में सबको दिव्य सुख दिया। उनकी करुणा सिर्फ मनुष्यों तक नहीं थी, गोवर्धन पर्वत उठाकर उन्होंने गोकुल वासियों, गायों और प्रकृति को इंद्र की वर्षा से बचाया, जो उनकी सार्वभौमिक दया का प्रमाण है। ये गुण हमें सिखाता है कि सच्ची करुणा से हम दुनिया को बेहतर बना सकते हैं, क्योंकि ये सिर्फ भावना नहीं, बल्कि कर्म है जो दूसरों को ऊपर उठाता है। अगर हम कृष्ण की तरह करुणावान बनें, तो हमारे रिश्ते मजबूत होंगे और जीवन सार्थक होगा।

धैर्य:
धैर्य यानी सहनशीलता, वो गुण जो मुश्किलों में भी शांत रखता है। कृष्ण ने जीवन भर धैर्य का उदाहरण दिया, कभी जल्दबाजी नहीं की। महाभारत में, जब कौरवों ने पांडवों को बार-बार अपमानित किया, तो कृष्ण ने युद्ध से पहले शांति दूत बनकर धैर्य से दुर्योधन से बात की, उन्होंने कहा कि पांच गांव देकर युद्ध टालो, लेकिन दुर्योधन नहीं माना। फिर भी कृष्ण ने धैर्य रखा और जरूरी होने पर ही युद्ध की सलाह दी। बाल लीला में, पूतना राक्षसी आई तो कृष्ण ने धैर्य से उसका सामना किया और उसे मारकर भी उसको मुक्ति दी। गीता में कृष्ण ने धृति (धैर्य) को गुण बताया, जैसे क्षमा और अक्रोध के साथ। एक और उदाहरण है जब दुर्योधन ने कृष्ण को कैद करने की कोशिश की, लेकिन कृष्ण ने धैर्य से विश्वरूप दिखाकर उसे चेतावनी दी। ये गुण हमें बताता है कि जल्दबाजी से काम बिगड़ते हैं, जबकि धैर्य से समस्याएं हल होती हैं। कृष्ण का धैर्य इतना मजबूत था कि वे कभी क्रोध में नहीं आए, बल्कि सोच-समझकर निर्णय लेते थे। हम भी अगर धैर्य अपनाएं, तो जीवन की चुनौतियां आसान हो जाएंगी।
क्षमा:
क्षमा यानी माफ करना, वो गुण जो गलतियों को भूलकर आगे बढ़ने देता है। कृष्ण ने कई बार दुश्मनों को भी माफ किया, जैसे शिशुपाल ने उन्हें 100 बार अपमान किया, लेकिन कृष्ण ने अपनी मौसी से वादा किया था तो 100 गलतियां माफ कीं, 101वीं पर ही सुदर्शन चक्र से वध किया। महाभारत में ये घटना राजसूय यज्ञ में हुई, जहां शिशुपाल के अपमान के बाद भी कृष्ण ने धैर्य रखा। कंस के साथ भी, कृष्ण ने कई मौके दिए लेकिन अंत में वध किया। गीता में कृष्ण ने क्षमा को दैवीय गुण बताया, जो मन को शांत रखता है। ये गुण हमें सिखाता है कि क्षमा से हमारा मन शांत रहता है और रिश्ते मजबूत होते हैं। कृष्ण की क्षमा कर्मों में दिखती थी, जैसे उन्होंने अर्जुन को युद्ध में क्षमा भाव सिखाया। अगर हम क्षमावान बनें, तो जीवन में शांति आएगी।
न्याय:
न्याय यानी इंसाफ, सही और गलत के बीच संतुलन। कृष्ण हमेशा सत्य के साथ खड़े रहते थे। गीता में उन्होंने अर्जुन को बताया कि धर्म की रक्षा के लिए युद्ध जरूरी है, क्योंकि अधर्म को रोकना न्याय है। जरासंध ने कई राजाओं को कैद किया तो कृष्ण ने भीम से उसका वध करवाकर न्याय किया। महाभारत में कृष्ण ने द्रौपदी के अपमान पर न्याय की बात की। गीता में वे कहते हैं कि वे सबको समान देखते हैं, कोई पक्षपात नहीं। ये गुण दिखाता है कि कृष्ण सत्य के साथ थे। जीवन में न्याय हमें ईमानदार बनाता है, और कृष्ण का उदाहरण हमें प्रेरित करता है कि मुश्किल में सही फैसला लें।
निष्पक्षता:
निष्पक्षता यानी बिना पक्ष लिए निर्णय। महाभारत में कृष्ण ने दुर्योधन और अर्जुन दोनों को मदद की पेशकश की, एक को अपनी नारायणी सेना, दूसरे को खुद (बिना हथियार के)। अर्जुन ने कृष्ण को चुना, दुर्योधन ने सेना, लेकिन कृष्ण ने दोनों को समान मौका दिया। द्वारका में वे राजा के रूप में सबके साथ समान व्यवहार करते थे। ये गुण हमें बताता है कि पक्षपात से समाज टूटता है, जबकि निष्पक्षता से एकता आती है। कृष्ण की ये कला उन्हें सच्चा नेता बनाती है।
निरासक्त/वैराग्य:
निरासक्त/वैराग्य यानी मोह से मुक्ति। कृष्ण ने कभी सांसारिक चीजों से मोह नहीं किया। गीता में उन्होंने कहा कि कर्म करो, फल की चिंता मत करो, ये वैराग्य है। गोवर्धन लीला में इंद्र का अहंकार तोड़ा लेकिन खुद को बड़ा नहीं माना। वैराग्य सत्व गुण से आता है। ये गुण हमें सिखाता है कि सुख-दुख में समान रहना महत्वपूर्ण है। कृष्ण का वैराग्य उन्हें योगी बनाता है।

ध्यान और तपस्या:
ध्यान और तपस्या यानी मन की एकाग्रता और अनुशासन। कृष्ण ने बाल्यकाल में कालिया नाग से लड़ाई में तप दिखाया। गीता में योग और ध्यान की शिक्षा दी। तपस्या तीन प्रकार की होती है, शरीर, वाणी, मन की। ये गुण दिखाता है कि तपस्या से शक्ति मिलती है। कृष्ण की तपस्या हमें प्रेरित करती है कि रोजाना ध्यान से मजबूत बनें।
सौंदर्यमय:
सौंदर्यमय यानी रूप की पूर्णता। कृष्ण का रूप मनमोहक था, श्याम सुंदर, नीली त्वचा, पीतांबर, मोर मुकुट। उनकी आंखें कमल जैसी, मुस्कान लुभावनी थी। लेकिन सौंदर्य आंतरिक था, प्रेम से भरा। ये गुण हमें बताता है कि सच्चा सौंदर्य मन से आता है।
सर्वनियंता:
सर्वनियंता का मतलब है वो जो पूरे ब्रह्मांड को नियंत्रित करता है, जैसे सबका मालिक। श्री कृष्ण में ये गुण सबसे प्रमुख था क्योंकि वे भगवान विष्णु के पूर्ण अवतार थे, जो सृष्टि की रचना, पालन और संहार करते हैं। भागवत पुराण की एक प्रसिद्ध कथा में, जब बाल कृष्ण खेलते हुए मिट्टी खा रहे थे, तो माँ यशोदा ने उनका मुँह खोला। अंदर उन्हें पूरा ब्रह्मांड दिखाई दिया, ग्रह, नक्षत्र, पृथ्वी, समुद्र, सब कुछ। यशोदा चकित रह गईं, और ये दिखाता है कि कृष्ण सिर्फ एक बच्चा नहीं, बल्कि सारी सृष्टि के नियंत्रक थे। महाभारत में भी, कृष्ण ने कुरुक्षेत्र युद्ध का पूरा नियंत्रण संभाला। वे सारथी बनकर अर्जुन को निर्देश देते थे, लेकिन असल में पूरे युद्ध की दिशा तय कर रहे थे, कब लड़ना, कब रुकना। जैसे जब भीम और दुर्योधन लड़ रहे थे, कृष्ण ने संकेत देकर भीम को दुर्योधन की जांघ पर वार करने को कहा। शास्त्रों में कृष्ण को 64 गुणों वाला बताया गया है, और इनमें से एक है सर्वनियंता होना, जहां वे सभी देवताओं से ऊपर हैं, यहां तक कि ब्रह्मा और शिव से भी। ये गुण हमें सिखाता है कि सच्चा नियंत्रण शक्ति से नहीं, ज्ञान और समझ से आता है। कृष्ण सबके भाग्य के लेखक थे, फिर भी उन्होंने मनुष्यों को कर्म की स्वतंत्रता दी। अगर हम अपने जीवन में ये अपनाएं, तो छोटी-छोटी चीजों पर नियंत्रण रखकर बड़ा फर्क ला सकते हैं।
सर्वज्ञाता:
सर्वज्ञाता यानी हर तरह की कला और विद्या में पारंगत। श्री कृष्ण को 64 कलाओं का पूर्ण ज्ञान था, जो उन्होंने गुरु संदीपनी से सीखा था। ये कलाएँ क्या हैं? जैसे गायन, वादन, नृत्य, चित्रकला, धातु विज्ञान, योग, वार्तालाप की कला, फूल सजाना, रंगमंच, जादू, वास्तुशास्त्र, और यहां तक कि युद्धकला और राजनीति। उदाहरण के लिए, कृष्ण युद्धकला में इतने निपुण थे कि उन्होंने जरासंध जैसे शक्तिशाली राजा को हराने की रणनीति बनाई। राजनीति में, वे द्वारका के राजा थे और पांडवों के सलाहकार, जहां उन्होंने कूटनीति से कई संकट हल किए। गीता में अर्जुन को उपदेश देकर उन्होंने ज्ञान की सर्वोच्च कला दिखाई, वो था आत्मज्ञान। भागवत पुराण में बताया गया है कि कृष्ण सर्वज्ञाता के मालिक थे, यानी सभी कलाओं के गुरु, जैसे कविता, नाटक, चित्रकारी वगैरह। ये गुण हमें बताता है कि जीवन में सिर्फ एक हुनर नहीं, बल्कि कई क्षेत्रों में सीखते रहना चाहिए। कृष्ण की तरह, अगर हम बहुमुखी बनें, तो चुनौतियों का सामना आसान हो जाता है। हम छात्र बन सकते हैं, लेकिन कृष्ण जैसे गुरु से प्रेरणा लेकर।
सत्यवादी:
सत्यवादी यानी जो हमेशा सत्य बोलता हो और सत्य की रक्षा करता हो। श्री कृष्ण को सत्य का प्रतीक माना जाता है, क्योंकि वे कभी भी झूठ का सहारा नहीं लेते थे, बल्कि सत्य को स्थापित करने के लिए रणनीति अपनाते थे। गीता में उन्होंने अर्जुन से कहा कि सत्य बोलो, लेकिन प्रिय बोलो। हालांकि, महाभारत में कुछ घटनाएँ हैं जहां कृष्ण ने युक्ति का इस्तेमाल किया, जैसे द्रोणाचार्य को मारने के लिए अश्वत्थामा के बारे में आधा सत्य कहना, लेकिन ये धर्म युद्ध की रक्षा के लिए था। असल में, कृष्ण ने कभी व्यक्तिगत लाभ के लिए झूठ नहीं बोला, उनका हर शब्द सत्य और न्याय पर आधारित था। शास्त्रों में कृष्ण के 64 गुणों में वे सत्यनिष्ठ और कृतज्ञ बताए गए हैं। ये गुण हमें सिखाता है कि सत्य बोलना आसान नहीं, लेकिन ये जीवन की नींव है। अगर हम कृष्ण की तरह सत्यवादी बनें, तो रिश्ते मजबूत होंगे और मन शांत रहेगा। वेदों में उन्हें सत्यं ज्ञानं अनंतं ब्रह्म कहा गया है, यानी सत्य ही उनका स्वरूप है।
अपराजेय:
अपराजेय यानी कभी न हारने वाली शक्ति। श्री कृष्ण अजेय थे क्योंकि वे दिव्य थे, और उनकी शक्ति असीम थी। उन्होंने कंस, जरासंध, शिशुपाल, नरकासुर जैसे कई राक्षसों को हराया। कंस तो उनका मामा था, जो उसे मारने के लिए हर कोशिश करता था, लेकिन कृष्ण ने आसानी से उसे वध किया। जरासंध ने 17 बार हमला किया, लेकिन कृष्ण ने भीम के माध्यम से उसे हराया। महाभारत में, वे खुद नहीं लड़े, लेकिन उनकी मौजूदगी से पांडव जीते। कृष्ण के गुणों में वे सर्वशक्तिमान और अजेय बताए गए हैं, जहां कोई उन्हें हरा नहीं सकता। ये गुण दिखाता है कि सच्ची अजेयता शारीरिक ताकत से नहीं, बल्कि बुद्धि और धर्म से आती है। कृष्ण की अजेयता हमें प्रेरित करती है कि मुश्किलों में भी हार न मानें, बल्कि सोच-समझकर आगे बढ़ें। वे सर्वोच्च थे, इसलिए उनकी जीत निश्चित थी।

संगीतज्ञ:
संगीतज्ञ यानी संगीत में माहिर, खासकर बांसुरी बजाने में। कृष्ण की बांसुरी की धुन इतनी मधुर थी कि वो गोपियों, जानवरों और यहां तक कि प्रकृति को भी आकर्षित करती थी। भागवत पुराण में रासलीला की कथा है, जहां कृष्ण बांसुरी बजाते थे और गोपियाँ सब छोड़कर उनके पास चली आती थीं। ये धुन ब्रह्मांड को आकर्षित करती थी, जैसे वे अपनी बांसुरी से सभी जीवों को मोहित करते थे। कृष्ण के 64 गुणों में वे सभी कलाओं के ज्ञाता थे, और संगीत इसमें शामिल था। ये गुण हमें सिखाता है कि संगीत से मन को शांति मिलती है, और कृष्ण की तरह अगर हम कोई कला सीखें, तो वो हमें खुशी दे सकती है। उनकी बांसुरी आज भी भक्तों के दिलों में बजती है।
नृत्यज्ञ:
नृत्यज्ञ यानी नृत्य में पारंगत। कृष्ण रासलीला में गोपियों के साथ नृत्य करते थे, जो प्रेम और आनंद का प्रतीक था। भागवत पुराण में वर्णन है कि कृष्ण एक साथ कई रूप धारण कर हर गोपी के साथ नाचते थे, और ये नृत्य दिव्य था। ये उनकी कलाओं का हिस्सा था, जहां वे नृत्य से भक्ति व्यक्त करते थे। ये गुण दिखाता है कि नृत्य सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मा की अभिव्यक्ति है। कृष्ण की तरह, अगर हम जीवन को नृत्य की तरह जीएं, तो हर पल खुशी से भर जाएगा।
दानशील:
दानशील यानी दान देने का गुण। कृष्ण बेहद उदार थे, जैसे जब उनके पुराने दोस्त सुदामा गरीबी में आए, तो कृष्ण ने उन्हें बिना मांगे धन-धान्य से भर दिया। सुदामा ने सिर्फ चावल दिए थे, लेकिन कृष्ण ने उन्हें राजा बना दिया। महाभारत में भी, वे पांडवों को हमेशा मदद करते थे। शास्त्रों में कृष्ण को कृतज्ञ और उदार बताया गया है। ये गुण हमें सिखाता है कि उदारता से खुशी दोगुनी होती है। कृष्ण की उदारता हमें प्रेरित करती है कि जरूरतमंदों की मदद करें।
नीतीवादी:
धर्म का अवतार यानी धर्म की मूर्ति। कृष्ण ने धर्म की स्थापना के लिए अवतार लिया, जैसे गीता में उन्होंने अर्जुन को धर्मयुद्ध सिखाया। वे धर्म की रक्षा करते थे, चाहे वो गोवर्धन उठाना हो या महाभारत में पांडवों का साथ देना। विष्णु सहस्रनाम में उन्हें सर्वेश्वर कहा गया है, जो सभी का नियंत्रक और धर्म का रक्षक है। ये गुण दिखाता है कि धर्म जीवन का आधार है। कृष्ण की तरह, अगर हम सही मार्ग पर चलें, तो सब ठीक हो जाता है।
अब आप समझ गए होंगे भगवान श्रीकृष्ण की 16 कलाएँ का अर्थ
इन 16 कलाओं की बात करना किसी नंबर को पूरा करने जैसा नहीं है। यह तो एक ऐसी चेतना की पूरी तस्वीर है, जो अपने आप में शक्तिशाली होने के बावजूद दयालु है, न्यायप्रिय होने पर भी क्षमाशील है, दुनिया से अलग होने पर भी पूरी तरह से उसमें शामिल है।
जो भक्त हैं, उनके लिए ये सिर्फ कृष्ण में देखने वाले गुण नहीं हैं। बल्कि ये ऐसे आदर्श हैं, जो हमें अपने आध्यात्मिक सफर में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। यह एक ऐसा रास्ता है, जिस पर चलकर एक इंसान अपनी श्रेष्ठतम स्थिति तक पहुँच सकता है।





🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
जो भी प्रेम से ‘जय श्री कृष्ण’ बोले, उनकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण हों।” जय राधे राधे.,… 👏👏
🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
जो भी प्रेम से ‘जय श्री कृष्ण’ बोले, उनकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण हों।” जय राधे राधे… 👏👏
अंततः…… हम सही मार्ग पर चलें
अप्रतिम 🙏🙏