संत जयदेव महाराज: वो कवि सम्राट जिनकी रचना को भगवान ने खुद पूरा किया

संत जयदेव महाराज का जीवन परिचय, गीत गोविंद रचना और भगवान कृष्ण के साथ उनके अद्भुत अनुभव। जानिए कैसे भगवान ने स्वयं उनकी काव्य रचना को पूरा किया।

भगवान के सामने भी शर्मा गए थे जयदेव

कभी सोचा है कि भगवान खुद किसी की पंक्ति पूरी करने आ जाएं? जी हां, ऐसा हुआ था। और यह कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं, बल्कि भारतीय भक्ति परंपरा का एक सच्चा प्रसंग है। आज हम बात करने जा रहे हैं महाकवि जयदेव की, जिनकी रचना ‘गीत गोविन्द’ आज भी पूरी दुनिया में गाई जाती है।

बारहवीं शताब्दी का वो समय था जब ओडिशा की धरती पर एक ऐसे महाकवि का जन्म हुआ, जिनकी रचना आज भी करोड़ों हृदयों में भक्ति रस का संचार करती है। संत जयदेव महाराज सिर्फ एक कवि नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे भक्त थे जिनके साथ भगवान स्वयं खेलने आते थे। आज हम बात करेंगे उस संत की, जिन्होंने अपनी लेखनी से संस्कृत साहित्य को अमर कर दिया और जिनकी भक्ति इतनी प्रगाढ़ थी कि स्वयं श्रीकृष्ण को उनके घर आना पड़ा।

प्रारंभिक जीवन और परिवार

केन्दुबिल्व नामक गांव में एक ब्राह्मण परिवार में जयदेव का जन्म हुआ था। यह गांव भुवनेश्वर के निकट था और आज भी वैष्णव भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल माना जाता है। उनके पिता का नाम भोजदेव और माता का नाम वामादेवी था।

जीवन की शुरुआत ही कठिनाइयों से भरी रही। बचपन में ही माता-पिता का साया सिर से उठ गया। लेकिन शायद यही परिस्थिति उन्हें भगवान के और करीब ले गई। अनाथ बालक को आश्रय मिला भगवान जगन्नाथ की शरण में। वे घंटों राधा-कृष्ण की लीलाओं में खो जाते थे।

जीवन में आया मोड़

जयदेव पुरी में जगन्नाथ के दर्शन करने गए थे। वहां पहुंचकर उन्होंने एक वृक्ष के नीचे रहकर भगवान का भजन-कीर्तन शुरू कर दिया। उनका वैराग्य देखकर अनेक संत-महात्मा उनके पास आने लगे। वे दुनियावी मोह-माया से दूर, बस प्रभु के नाम में लीन रहते थे।

अद्भुत विवाह की कथा

एक ब्राह्मण देवशर्मा अपनी पत्नी के साथ जगन्नाथ पूजा के लिए पुरी आया था। उसने भगवान से संतान की कामना की और कहा कि यदि कन्या हुई तो वह जीवनभर भगवान की सेवा में रहेगी।

भगवान जगन्नाथ ने एक रात स्वप्न में देवशर्मा को दर्शन दिए और कहा कि अपनी कन्या पद्मावती का विवाह उस वृक्ष के नीचे बैठे संन्यासी जयदेव से कर दो। प्रभु की आज्ञा मानकर देवशर्मा ने अपनी कन्या का हाथ जयदेव को सौंप दिया।

यह विवाह कोई साधारण विवाह नहीं था। यह स्वयं भगवान का आदेश था। पद्मावती एक सुशील, सुंदर और भगवान की परम भक्त थीं। वे जगन्नाथ मंदिर में नृत्य करती थीं और पूर्ण रूप से प्रभु सेवा में समर्पित थीं।

राजदरबार में प्रतिष्ठा

बंगाल के राजा लक्ष्मण सेन के दरबार में जयदेव को विशेष सम्मान प्राप्त था। वे पांच रत्नों में से एक माने जाते थे। लेकिन उनका मन तो सांसारिक प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि राधा-माधव के चरणों में लगा था।

गीत गोविंद: भक्ति का अमर महाकाव्य

प्रेरणा की उत्पत्ति

एक बार प्रभु की प्रेरणा से जयदेव के हृदय में विचार आया कि वे प्रभु चरित्र पर एक नवीन पुस्तक लिखें। तब श्री गीत गोविंद का अति सरस गीत प्रकट हुआ।

मथुरा-वृंदावन की यात्रा के दौरान राधा-कृष्ण की रासलीला भूमि को देखकर वे भाव-विभोर हो उठे। लौटने पर उन्होंने यह अद्भुत रचना की। इसमें केवल तीन पात्र हैं – राधा, कृष्ण और राधा की सखी। लेकिन इन तीन पात्रों के माध्यम से उन्होंने प्रेम के वे रंग भरे जो आज तक अतुलनीय हैं।

रचना की विशेषता

गीतगोविंद में कुल 12 सर्ग और 24 प्रबंध हैं, जिनमें 72 श्लोक हैं। प्रत्येक प्रबंध में आठ पद हैं जिन्हें अष्टपदी कहा जाता है। यह कोई साधारण काव्य नहीं था। यह संगीतबद्ध था, नृत्य योग्य था और भक्ति से ओतप्रोत था।

कहा जाता है कि जयदेव ने दिव्य रस के स्वरूप राधाकृष्ण की रमणलीला का स्तवन कर आत्मशांति की सिद्धि की। यह काव्य केवल मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि साधना का माध्यम बना।

भगवान के साथ बिताए अविस्मरणीय क्षण

पद को पूरा करने आए स्वयं भगवान

जयदेव के जीवन की सबसे अद्भुत घटना तब घटी जब वे गीत गोविंद की एक अष्टपदी लिख रहे थे। राधा के मान का प्रसंग था, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अपनी प्रिया के चरणकमलों को अपने मस्तक पर रखने की प्रार्थना करते हैं।

जयदेव के मन में यह भाव आया, परंतु उसे मुख से कहते हुए वे संकोच में पड़ गए। वे सोचने लगे कि इस गुप्त रहस्य को कैसे प्रकट किया जाए।

पद्मावती ने कहा कि गंगा स्नान करके आने पर शेष चरण लिख लेंगे। जयदेव स्नान के लिए चले गए। कुछ ही देर बाद जयदेव का वेष धारण कर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण आए।

भगवान ने पद्मावती से गीत गोविंद मांगा और “देहि मे पदपल्लवमुदारम्” लिखकर कविता पूरी कर दी। फिर पद्मावती के हाथ का भोजन ग्रहण किया और पलंग पर विश्राम करने लगे।

जब असली जयदेव स्नान करके लौटे तो पद्मावती ने उनसे पूछा कि आप वापस कैसे आ गए? जयदेव चकित रह गए। जब उन्होंने देखा कि पद पूर्ण हो चुका है तो उनकी आंखों से अश्रुधारा बह निकली। वे समझ गए कि स्वयं प्रभु ने उनकी रचना पूरी की है।

उनके हृदय में भाव उमड़ आए – भगवान को उनके लिए कष्ट उठाना पड़ा। उनका भक्त हृदय मार्मिक वेदना से घायल हो गया।

छप्पर छाने में सहायता

केन्दुबिल्व में रहते समय एक दिन जयदेव छप्पर छा रहे थे। कड़ाके की धूप थी। पद्मावती फूस पकड़ा रही थी, फिर वह रसोई बनाने चली गई।

धूप में जयदेव को अकेले कार्य करते देखकर राधामाधव को दया आई। राधामाधव ने स्वयं फूस उठा-उठाकर देना शुरू कर दिया। जयदेव भगवद्भक्ति में मग्न थे, उन्हें लगा कि उनकी पत्नी सहायता कर रही है।

काम समाप्त होने पर जब वे राधामाधव के श्रीविग्रह की सेवा करने गए तो देखा कि प्रभु के हाथों में कालिख लगी हुई है। जयदेव के नयनों से अश्रु प्रवाहित हो उठे। भगवान ने उनके लिए श्रम किया था।

धन्य थे वे जिनके लिए साक्षात भगवान ने मजदूरी की!

चोरों से रक्षा

एक बार जयदेव को राजा ने बहुत सारा धन-वस्त्र भेंट दिया। वे उसे लेकर लौट रहे थे। रास्ते में कुछ चोरों ने उन्हें घेर लिया और सब कुछ लूट लिया। चोर इतने क्रूर थे कि उन्होंने जयदेव के हाथ-पैर काट डाले।

लेकिन भगवान अपने भक्त को कैसे तड़पते देख सकते थे? अलौकिक कृपा से उनके अंग पुनः सही हो गए। यह घटना जयदेव के लिए एक और सबक बनी कि सांसारिक धन-संपत्ति नाशवान है, केवल भगवान का नाम ही शाश्वत है।

संगीत और नृत्य की जुगलबंदी

एक मधुर परंपरा थी उनके घर में। जयदेव अष्टपदी गाते थे और पद्मावती उस पर नृत्य करती थीं। दोनों प्रभु की भक्ति में इस तरह डूबे रहते कि सारा घर मानो वृंदावन बन जाता।

13वीं शताब्दी के मध्य से ही जगन्नाथ मंदिर में गीत गोविंद को नित्य सेवा के रूप में अंगीकार किया जाता है। जगन्नाथ पुरी में आज भी देवदासियां इन अष्टपदियों पर ओडिशी नृत्य प्रस्तुत करती हैं।

गीत गोविंद का प्रभाव और महत्व

धार्मिक महत्व

गीत गोविंद को वैष्णव साधना में भक्तिरस का शास्त्र कहा गया है। श्रीवल्लभ संप्रदाय में इसे श्रीमद्भागवत पुराण के समान प्रतिष्ठा प्राप्त है। यह केवल काव्य नहीं, यह एक साधना ग्रंथ है।

जयदेव ने उस समय के समाज को, जो शंकराचार्य के सिद्धांत के अनुरूप आत्मा और मायावाद में उलझा हुआ था, राधाकृष्ण की रसयुक्त लीलाओं की भावुकता और सरसता से आनंदविभोर किया।

साहित्यिक उत्कृष्टता

नाभादास ने भक्तमाल में लिखा है – “कवि जयदेव कवियों में सम्राट हैं, जबकि अन्य कवि छोटे राज्यों के शासकों के समान हैं।” यह सम्मान किसी साधारण कवि को नहीं मिलता।

कला पर प्रभाव

जम्मू और कांगड़ा में बसोहली शैली के चित्र गीत गोविंद से प्रेरित हैं। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इसका हिंदी पद्यानुवाद किया। देश-विदेश की अनेक भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ है।

गीत गोविन्द के कुछ प्रसिद्ध पद

गीत गोविन्द की शुरुआत इस प्रार्थना से होती है:

“मेघैर्मेदुरमम्बरं वनभुवः श्यामास्तमालद्रुमै:”

(बादलों से घिरा आकाश, तमाल के पेड़ों से हरा-भरा जंगल…)

सबसे प्रसिद्ध अष्टपदी है जिसमें दस अवतारों का वर्णन है:

“वेदान्उद्धरते जगन्निवहते भूगोलमुद्बिभ्रते…”

(प्रलय के जल से वेदों को बचाने वाले, जगत का पालन करने वाले, पृथ्वी को धारण करने वाले…)

प्रेरणादायक शिक्षाएं

निष्काम भक्ति

जयदेव ने सिखाया कि भक्ति निस्वार्थ होनी चाहिए। उन्होंने राजदरबार के सम्मान से ज्यादा भगवान की सेवा को महत्व दिया। उनके लिए धन-संपत्ति कुछ नहीं थी। चोरों ने जब सब कुछ लूट लिया, तब भी उन्होंने भगवान पर शक नहीं किया।

प्रेम की पराकाष्ठा

गीत गोविंद में जो प्रेम दर्शाया गया है, वह सांसारिक नहीं, अलौकिक है। राधा-कृष्ण का प्रेम जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। यह शरीर का प्रेम नहीं, आत्मा का प्रेम है।

समर्पण का भाव

जयदेव ने अपना सब कुछ भगवान को समर्पित कर दिया। उनकी कला, उनका जीवन, उनका हर श्वास – सब कुछ प्रभु के लिए था। यही समर्पण का सच्चा अर्थ है।

संत जयदेव की विरासत

आज सैकड़ों साल बाद भी जयदेव की रचना उतनी ही प्रासंगिक है। हर भाषा में, हर संप्रदाय में, हर मंदिर में गीत गोविंद के पद गूंजते हैं।

कहा जाता है कि जो भी व्यक्ति श्रद्धा से शुद्ध कंठ से इसका पाठ करता है, ठाकुर श्रीकृष्ण स्वयं उसे सुनने अवश्य पधारते हैं। यह विश्वास आज भी करोड़ों भक्तों का है।

आज भी जीवित है जयदेव की परंपरा

आज 800 साल बाद भी जयदेव का नाम और उनकी रचना जीवित है। हर साल ओडिशा में जयदेव महोत्सव मनाया जाता है। पुरी में आज भी उनके पद गूंजते हैं।

गीत गोविन्द को लेकर कई नृत्य नाटिकाएं बनाई गई हैं। आधुनिक संगीतकारों ने इसे नए रूप में पेश किया है। कई फिल्मों और टीवी सीरियलों में इसके पद इस्तेमाल किए गए हैं।

अंतिम शब्द

संत जयदेव महाराज का जीवन एक प्रेरणास्पद यात्रा है। बचपन में अनाथ, फिर संन्यासी, फिर गृहस्थ, लेकिन हर अवस्था में वे भगवान के थे और भगवान उनके थे। उनकी कलम से निकले शब्द केवल शब्द नहीं थे, वे मंत्र थे, प्रार्थना थे, भक्ति थे।

जब हम उनके जीवन को देखते हैं तो समझ आता है कि सच्ची भक्ति क्या होती है। भगवान दूर नहीं हैं। जो सच्चे मन से पुकारता है, वे उसके पास जरूर आते हैं। जयदेव के जीवन में भगवान कितनी बार आए – कविता पूरी करने, छप्पर छाने में मदद करने, विपत्ति से बचाने। क्योंकि जयदेव का प्रेम सच्चा था, निश्छल था।

आज के युग में जब हम भक्ति को भूलते जा रहे हैं, जयदेव का जीवन हमें याद दिलाता है कि जीवन का असली उद्देश्य क्या है। धन नहीं, प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि प्रभु चरणों में प्रेम ही जीवन की सार्थकता है।

नोट: यह लेख भारतीय भक्ति परंपरा में प्रचलित मान्यताओं और ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर लिखा गया है। जयदेव महाराज का जीवन और उनकी रचनाएं भारतीय सांस्कृतिक धरोहर का अनमोल हिस्सा हैं।
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