महावतार बाबाजी हिमालय के अमर योगी हैं जिन्होंने क्रिया योग को पुनर्जीवित किया। जानिए उनके जीवन की अनकही बातें, लाहिड़ी महाशय से मिलन और आध्यात्मिक शिक्षाओं के बारे में।
हिमालय का वह रहस्य जो सदियों से जीवित है
क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे देश में ऐसे सिद्ध संत हैं जो सदियों से जीवित हैं? जिनका शरीर समय की धारा से परे है और जो आज भी मानवता की भलाई के लिए गुप्त रूप से कार्य कर रहे हैं? ऐसे ही एक महान योगी हैं महावतार बाबाजी, जिनका नाम सुनते ही मन में श्रद्धा और जिज्ञासा दोनों जाग उठती है।
जब 1946 में परमहंस योगानंद ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी” में पहली बार दुनिया को इन अमर योगी के अस्तित्व के बारे में बताया, तो पूरी दुनिया चौंक गई। एक ऐसा सिद्ध जो हिमालय की गुफाओं में रहता है, जिसका शरीर हजारों वर्षों से युवा है, और जो मानवता को आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाने के लिए चुपचाप काम कर रहा है।
कौन हैं ये रहस्यमयी संत?
महावतार बाबाजी एक महासिद्ध योगी हैं जिन्होंने सामान्य मानवीय सीमाओं को पार कर लिया है। उनका जन्म 30 नवंबर, 203 ईस्वी में तमिलनाडु के एक तटीय गांव पारंगीपेट्टई में हुआ था। उन्हें नागराज नाम दिया गया था, जिसका अर्थ है “सर्पों का राजा”। यह नाम हमारे भीतर की उस अपार दिव्य शक्ति का प्रतीक है जो कुंडलिनी के रूप में विद्यमान रहती है।
उनके माता-पिता नंबूदिरी ब्राह्मण थे और उनके पिता शिव मंदिर में पुजारी थे। पांच वर्ष की उम्र में नागराज का अपहरण एक व्यापारी ने कर लिया और उन्हें कोलकाता में दास के रूप में बेच दिया। लेकिन यह दुर्भाग्य उनकी आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत बन गया।
योग सिद्धि की अद्भुत यात्रा
एक धनी व्यक्ति ने बालक नागराज को खरीदा और उन्हें मुक्त कर दिया। बाद में महान सिद्ध बोगनाथर ने उन्हें अपना शिष्य बना लिया। 15 वर्ष की आयु में, बोगनाथर ने उन्हें अपने गुरु अगस्त्य ऋषि के पास भेजा, जो कुट्रलम के पास रहते थे।
48 दिनों की कठोर योगाभ्यास के बाद अगस्त्य ऋषि प्रकट हुए और उन्होंने नागराज को क्रिया कुंडलिनी प्राणायाम की दीक्षा दी। इसके बाद अगस्त्य ऋषि ने युवा नागराज को बद्रीनाथ की हिमालयी गुफाओं में जाकर साधना करने का निर्देश दिया।
अगले 18 महीनों तक नागराज ने एक गुफा में अकेले रहकर अपने गुरुओं द्वारा सिखाई गई योग तकनीकों का गहन अभ्यास किया। अपने अहंकार को पूरी तरह से समर्पित करके, वे परमात्मा के साथ पूर्णतः एक हो गए। उनके शरीर की प्रत्येक कोशिका परिवर्तित हो गई। वे एक पूर्ण सिद्ध बन गए – एक ऐसा योगी जिसका शरीर मृत्यु और रोग से मुक्त हो गया। उस क्षण से, इस महान संत ने खुद को पीड़ित मानवता के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया।
1861 का वह ऐतिहासिक मिलन – लाहिड़ी महाशय और क्रिया योग का पुनर्जन्म
सदियों से गुप्त रखे गए क्रिया योग को आधुनिक युग में लाने के लिए बाबाजी ने एक विशेष शिष्य को चुना – लाहिड़ी महाशय। यह मिलन सिर्फ एक गुरु और शिष्य की मुलाकात नहीं थी, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक वरदान साबित हुई।
शरद ऋतु 1861 में, 33 वर्षीय श्यामा चरण लाहिड़ी दानापुर में सैन्य इंजीनियरिंग विभाग में लेखाकार के रूप में कार्यरत थे। एक दिन उन्हें रानीखेत स्थानांतरित कर दिया गया। हिमालय की सुंदर पहाड़ियों में घूमते समय, उन्हें दूर से अपना नाम पुकारती हुई एक आवाज सुनाई दी।
जब वे पहाड़ी पर चढ़े, तो उन्होंने एक युवा संत को देखा जो उनका स्वागत कर रहे थे। आश्चर्यजनक रूप से, तांबे के रंग के बालों को छोड़कर, वह संत उनके जैसा ही दिखता था। यह वही अमर सिद्ध थे।
इन महान गुरु ने बताया कि यह वे ही थे जिन्होंने मानसिक रूप से लाहिड़ी के अधिकारी को रानीखेत में उनका स्थानांतरण करने के लिए प्रेरित किया था। जब उन्होंने लाहिड़ी के माथे को छुआ, तो एक अद्भुत विद्युत प्रवाह उनके मस्तिष्क में बहा और पिछले जन्म की मधुर स्मृतियां जाग उठीं।
लाहिड़ी महाशय को याद आया कि वे अपने पिछले जन्म में इसी गुफा में कई वर्ष बिता चुके थे और बाबाजी उनके सदा से गुरु रहे हैं।
इस हिमालयी सिद्ध ने एक सुनहरे महल को प्रकट किया और वहां एक यज्ञ वेदी के सामने लाहिड़ी महाशय को क्रिया योग की दीक्षा दी। उन्होंने कहा, “जो क्रिया योग मैं तुम्हारे माध्यम से उन्नीसवीं शताब्दी में दुनिया को दे रहा हूं, यह उसी विज्ञान का पुनरुद्धार है जो भगवान कृष्ण ने हजारों साल पहले अर्जुन को दिया था, और जो बाद में पतंजलि, ईसा मसीह, सेंट जॉन, सेंट पॉल और अन्य शिष्यों को ज्ञात हुआ।”
लाहिड़ी महाशय को निर्देश दिया गया कि वे संसार में वापस जाएं और एक आदर्श गृहस्थ योगी के रूप में अपने सांसारिक कर्तव्यों को पूरा करें। इस तरह इन महान गुरु ने सिखाया कि मुक्ति अब केवल संन्यासियों का एकाधिकार नहीं रह गई – गृहस्थ भी अपने कर्तव्यों को छोड़े बिना ईश्वर-साक्षात्कार प्राप्त कर सकते हैं।
क्रिया योग – वह विज्ञान जो जीवन बदल देता है
क्रिया योग एक प्राचीन ध्यान विज्ञान है जो श्वास और प्राण नियंत्रण के माध्यम से आध्यात्मिक विकास को तीव्र करता है। भगवद गीता में भगवान कृष्ण इसका वर्णन करते हैं – “बाहर जाती हुई श्वास को अंदर आती हुई श्वास में और अंदर आती हुई श्वास को बाहर जाती हुई श्वास में अर्पित करने की प्रक्रिया।”
महर्षि पतंजलि ने अपने योग सूत्र में क्रिया योग का उल्लेख “शरीर अनुशासन, मन नियंत्रण और ओम पर ध्यान” के रूप में किया है। विभिन्न योग उपनिषदों में इसे अजपा विद्या, अजपा गायत्री, सो-हम प्राणायाम और कुंडलिनी योग के नाम से भी जाना जाता है।
यह तकनीक साधारण श्वास नियंत्रण से कहीं अधिक है। यह एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जो रीढ़ की हड्डी के माध्यम से प्राण ऊर्जा को नियंत्रित करती है, चक्रों को जागृत करती है और साधक को उच्चतम चेतना की स्थिति – निर्विकल्प समाधि की ओर ले जाती है।
परमहंस योगानंद और पश्चिम में क्रिया योग का प्रसार
इन अमर योगी की दूरदर्शिता केवल भारत तक सीमित नहीं थी। उन्होंने देखा कि आधुनिक युग में पश्चिम में भी आध्यात्मिक ज्ञान की आवश्यकता होगी।
1920 में, जब युवा स्वामी योगानंद (बाद में परमहंस योगानंद) अमेरिका जाने की तैयारी कर रहे थे, तो वे अपने कोलकाता के घर में गहन प्रार्थना में लीन थे। उसी समय वे स्वयं उनके सामने प्रकट हुए।
उन्होंने योगानंदजी से कहा: “अपने गुरु की आज्ञा का पालन करो और अमेरिका जाओ। डरो मत, तुम्हारी रक्षा की जाएगी। तुम वही हो जिसे मैंने पश्चिम में क्रिया योग का संदेश फैलाने के लिए चुना है।”
योगानंदजी ने 1920 से 1952 तक इस पवित्र मिशन को पूरा किया। उनके प्रयासों से लाखों पश्चिमी लोगों को क्रिया योग का ज्ञान मिला। जब 1952 में उन्होंने महासमाधि ली, तो एक चमत्कार हुआ – उनका शरीर 21 दिनों तक विघटित नहीं हुआ, जो क्रिया योग की शक्ति का जीवंत प्रमाण था।

अनकही शिक्षाएं जो जीवन बदल दें
हालांकि ये हिमालयी सिद्ध शायद ही कभी खुद को प्रकट करते हैं, उनकी शिक्षाएं उनके शिष्यों के माध्यम से हम तक पहुंची हैं। ये शिक्षाएं सरल होते हुए भी गहन हैं:
सार्वभौमिक प्रेम और समानता: एक बार लाहिड़ी महाशय इलाहाबाद के कुंभ मेले में गए। जब उन्होंने मन ही मन एक साधु को पाखंडी समझा, तो तुरंत बाबाजी उनके सामने प्रकट हुए। वे एक बालरोगी की तरह मुस्कुराते हुए एक संन्यासी के पैर धो रहे थे। उन्होंने बिना कुछ कहे लाहिड़ी को समझा दिया कि हमें किसी की आलोचना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि परमात्मा सभी में समान रूप से निवास करता है।
गृहस्थ जीवन में आध्यात्मिकता: इन महान गुरु ने यह क्रांतिकारी संदेश दिया कि मुक्ति के लिए संसार को त्यागना आवश्यक नहीं है। एक गृहस्थ भी अपने कर्तव्यों को पूरा करते हुए ईश्वर-साक्षात्कार प्राप्त कर सकता है। लाहिड़ी महाशय इसके जीवंत उदाहरण थे।
नियमित साधना का महत्व: क्रिया योग की नियमित और अनुशासित साधना ही आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है। एक बार का अभ्यास नहीं, बल्कि जीवनभर की प्रतिबद्धता चाहिए।
गुरु कृपा की आवश्यकता: सच्ची प्रगति बिना गुरु की कृपा के संभव नहीं है। योगिक आत्म-अध्ययन और आत्म-अनुशासन गुरु कृपा के लिए मार्ग तैयार करते हैं।
आज भी जीवित हैं ये अमर सिद्ध
अनेक साधकों और योगियों ने 20वीं और 21वीं सदी में भी इन महान संत के दर्शन किए हैं। 1949 में ब्रह्मचारी रबिनारायण (बाद में परमहंस हरिहरानंद) की गंभीर प्रार्थना के उत्तर में वे पुरी के करार आश्रम में प्रकट हुए।
1954 में बाबाजी ने बद्रीनाथ के पास गढ़वाल क्षेत्र में अपने आश्रम में एस.ए.ए. रामैया को 144 क्रिया योग तकनीकों की पूरी प्रणाली में दीक्षित किया। इसमें आसन, प्राणायाम, ध्यान, मंत्र और भक्ति साधनाएं शामिल थीं।
1970 के दशक में, ये हिमालयी योगी स्वामी सत्यस्वरूपानंद के सामने कुमाऊं हिमालय में प्रकट हुए और उन्हें लाहिड़ी महाशय के कार्यों का अनुवाद और प्रकाशन करने के लिए कहा।
यह तथ्य हमें बताता है कि महावतार बाबाजी आज भी जीवित हैं और मानवता की आध्यात्मिक प्रगति के लिए काम कर रहे हैं। वे केवल उन्हीं के सामने प्रकट होते हैं जो वास्तव में तैयार हों और जिनके माध्यम से वे दुनिया की भलाई कर सकें।
शिव का अवतार – दिव्य स्वरूप
कई आध्यात्मिक गुरुओं और साधकों ने बताया है कि ये अमर योगी भगवान शिव के अवतार हैं। उन्हें त्रयम्बक बाब, शिव बाबा और बडुआ बाबा जैसे विभिन्न नामों से भी जाना जाता है।
उनका रूप दिव्य है – युवा, सुंदर और तेजस्वी। वे कभी अदृश्य रहते हैं, कभी प्रकट होते हैं, और कभी अपना रूप बदल लेते हैं। वे समय और स्थान की सीमाओं से परे हैं। उनके दिव्य कार्य रहस्यमय हैं और सटीक विवरणों से परे हैं।
स्वामी श्री एम की आत्मकथा “अप्रेंटिस्ड टू अ हिमालयन मास्टर” में उल्लेख है कि इन महान सिद्ध ने अपना रूप भगवान शिव में बदल दिया। यह घटना इस बात का संकेत है कि वे केवल एक सिद्ध योगी नहीं, बल्कि दिव्य चेतना के प्रत्यक्ष अवतार हैं।
क्रिया योग की परंपरा और वंशावली
इन अमर सिद्ध से शुरू होने वाली क्रिया योग की परंपरा आज भी जीवित है। यह पवित्र वंशावली इस प्रकार है:
- महावतार बाबाजी – मूल गुरु और क्रिया योग के पुनर्जीवनकर्ता
- लाहिड़ी महाशय (1828-1895) – पहले आधुनिक गृहस्थ क्रिया योगी
- स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि (1855-1936) – लाहिड़ी महाशय के शिष्य
- परमहंस योगानंद (1893-1952) – पश्चिम में क्रिया योग के दूत
इस परंपरा के माध्यम से आज लाखों लोग दुनिया भर में क्रिया योग का अभ्यास कर रहे हैं और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर रहे हैं।

बाबाजी का संदेश – आज के युग के लिए
आज के भौतिकवादी युग में इन हिमालयी योगी का संदेश और भी प्रासंगिक हो गया है। वे हमें याद दिलाते हैं कि:
आध्यात्मिकता जीवन का मूल उद्देश्य है: हम केवल शरीर नहीं हैं, बल्कि अमर आत्मा हैं। जीवन का असली उद्देश्य इस सत्य को जानना और अनुभव करना है।
धर्म और जाति से परे है सत्य: ये महान संत किसी एक धर्म या संप्रदाय तक सीमित नहीं हैं। वे सार्वभौमिक सत्य के प्रतिनिधि हैं जो सभी धर्मों में समान रूप से विद्यमान है।
वैज्ञानिक आध्यात्मिकता की जरूरत: क्रिया योग केवल अंधविश्वास नहीं है, बल्कि एक वैज्ञानिक तकनीक है जिसे कोई भी अभ्यास कर सकता है और परिणाम देख सकता है।
विश्व शांति का मार्ग: उन्होंने कहा था कि क्रिया योग अंततः सभी देशों में फैलेगा और मनुष्य की व्यक्तिगत, अलौकिक धारणा के माध्यम से राष्ट्रों को सामंजस्य में लाने में सहायता करेगा।
कैसे जुड़ें इस पवित्र परंपरा से
यदि आप इस परंपरा से जुड़ना चाहते हैं, तो यहां कुछ सुझाव हैं:
क्रिया योग की दीक्षा लें: विश्वसनीय क्रिया योग संगठनों से संपर्क करें और उचित दीक्षा प्राप्त करें। बिना दीक्षा के क्रिया योग का अभ्यास नहीं करना चाहिए।
नियमित ध्यान और साधना करें: दीक्षा के बाद, नियमित और अनुशासित अभ्यास आवश्यक है। प्रतिदिन कम से कम दो बार ध्यान करना चाहिए।
आध्यात्मिक साहित्य पढ़ें: परमहंस योगानंद की “ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी” और अन्य प्रामाणिक क्रिया योग साहित्य का अध्ययन करें।
गुरु के प्रति श्रद्धा रखें: गुरु भक्ति आध्यात्मिक यात्रा का मूल है। इन महान सिद्ध और गुरु परंपरा के प्रति श्रद्धा और समर्पण रखें।
सत्संग में भाग लें: अन्य साधकों के साथ मिलकर ध्यान और चर्चा करने से आध्यात्मिक प्रगति तेज होती है।
गुफा – एक पवित्र तीर्थ स्थल
उत्तराखंड में द्वाराहाट के पास पंडुखोली पर्वत पर वह गुफा आज भी मौजूद है जहां 1861 में लाहिड़ी महाशय को क्रिया योग की दीक्षा मिली थी। यह स्थान आज एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल बन गया है।
हर साल हजारों भक्त इस पवित्र स्थल की यात्रा करते हैं। रानीखेत से यह 11 घंटे की पैदल यात्रा है, लेकिन साधक इसे बड़े भाव से पूरा करते हैं। गुफा में ध्यान करने का अनुभव अद्वितीय और दिव्य है।
योगोदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इंडिया हर वर्ष इस ऐतिहासिक घटना की वर्षगांठ मनाती है और पद यात्राओं का आयोजन करती है।

आधुनिक चमत्कार और दिव्य प्रकटीकरण
21वीं सदी में भी कई साधकों ने इन अमर योगी के दर्शन की रिपोर्ट की है। 2002 में, जब गुरु इमराम गिरि काकेशस पर्वत में तपस्या कर रहे थे, तो वे अपने दिव्य शरीर में प्रकट हुए और उन्हें क्रिया योग में दीक्षा दी।
2003 में, भगवान श्री सत्य साई बाबा ने इमराम पर शक्तिपात किया। इस तरह की घटनाएं हमें बताती हैं कि ये हिमालयी सिद्ध आज भी सक्रिय हैं और योग्य साधकों का मार्गदर्शन कर रहे हैं।
कई ध्यानियों ने बताया है कि गहन ध्यान में उन्हें इन महान गुरु के दर्शन हुए या उनकी उपस्थिति का अनुभव हुआ। ये अनुभव व्यक्तिगत और गहन होते हैं, लेकिन साधक के जीवन में रूपांतरण लाते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से क्रिया योग
आधुनिक विज्ञान ने भी योग और ध्यान के लाभों को स्वीकार करना शुरू कर दिया है। न्यूरोसाइंस के अध्ययनों ने दिखाया है कि नियमित ध्यान मस्तिष्क की संरचना को बदल सकता है, तनाव को कम कर सकता है।
एक अमर प्रेरणा
महावतार बाबाजी की कहानी केवल एक पौराणिक कथा नहीं है, बल्कि मानव चेतना की असीमित संभावनाओं का जीवंत प्रमाण है। वे हमें बताते हैं कि हम केवल शरीर नहीं, बल्कि अमर आत्मा हैं। वे साबित करते हैं कि मृत्यु और रोग पर विजय पाना संभव है।
इस तेज रफ्तार जीवन में, जब हम भौतिक सुखों की खोज में भटक जाते हैं, बाबाजी की शिक्षाएं हमें याद दिलाती हैं कि असली शांति और आनंद भीतर है। क्रिया योग वह चाबी है जो हमारे भीतर छिपे खजाने को खोल सकती है।
भले ही हम उनके सीधे दर्शन न कर पाएं, लेकिन उनकी परंपरा, उनकी शिक्षाएं और उनकी दिव्य कृपा आज भी उपलब्ध है। जरूरत है तो बस सच्ची लगन और समर्पण की।
महावतार बाबाजी का जीवन हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो आध्यात्मिक यात्रा पर निकलना चाहता है। वे हमें सिखाते हैं कि चाहे हम कितनी भी कठिन परिस्थितियों में क्यों न हों, हमारे भीतर वह शक्ति है जो हमें दिव्यता तक ले जा सकती है।
आज जब आप यह लेख पढ़ रहे हैं, तो शायद यह बाबाजी का ही संकेत है कि आध्यात्मिक यात्रा शुरू करने का समय आ गया है। तो क्यों न आज से ही अपनी आंतरिक खोज शुरू करें? क्यों न क्रिया योग की इस पवित्र परंपरा से जुड़ें?
महावतार बाबाजी की कृपा सदा उन पर बनी रहती है जो सच्चे मन से उनकी शरण में आते हैं। वे आज भी हिमालय में हैं, आज भी मानवता की भलाई के लिए काम कर रहे हैं, और आज भी उन साधकों का मार्गदर्शन कर रहे हैं जो वास्तव में तैयार हैं।




