जब रील से पहले रियल देखना जरूरी हो
रणवीर सिंह की फिल्म “धुरंधर” और उसका दूसरा भाग “Dhurandhar: The Revenge” इस वक्त पूरे देश में चर्चा में है। 5 दिसंबर 2025 को पहला भाग रिलीज हुआ और 19 मार्च 2026 को दूसरा। दोनों मिलाकर करीब साढ़े सात घंटे का सिनेमाई अनुभव।
लेकिन इस फिल्म में R. माधवन जो किरदार निभा रहे हैं, “अजय संयाल”, वो किसी काल्पनिक इंसान पर आधारित नहीं है। यह किरदार है उस असली शख्स से प्रेरित, जिसने सच में लाहौर की मस्जिदों में नमाज पढ़ी, सच में गोल्डन टेंपल में रिक्शावाले का वेश बनाकर घुसा, और सच में कंधार में तालिबान से आँख मिलाकर बात की।
उस शख्स का नाम है अजीत डोभाल। भारत के असली धुरंधर।

फिल्म में क्या है, असलियत में क्या था
फिल्म “धुरंधर” के निर्देशक आदित्य धर ने साफ कहा है कि यह फिल्म IC-814 हाईजैक, 2001 संसद हमले और 26/11 जैसी असली घटनाओं से प्रेरित है। R. माधवन का किरदार “अजय संयाल” सीधे तौर पर अजीत डोभाल से प्रेरित है। वो IB के डायरेक्टर हैं, उनका नजरिया आक्रामक है, और उनकी सोच है कि दुश्मन को उसके घर में घुसकर तोड़ो।
यह फिल्मी संवाद नहीं है। यह अजीत डोभाल की असली सोच है।
और जो रणवीर सिंह पर्दे पर करते हैं, वो असली जासूस किसी न किसी रूप में कर चुके हैं, बिना कैमरे के, बिना तालियों के, और बिना यह जानते हुए कि एक दिन इस पर फिल्म बनेगी।
वो शख्स जो पाकिस्तान में “मुसलमान” बनकर रहा
अजीत डोभाल का जन्म 20 जनवरी 1945 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में हुआ। पिता सेना में थे। अजमेर के मिलिट्री स्कूल से पढ़ाई, आगरा यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन, और 1968 में UPSC पास कर केरल कैडर में IPS। यहाँ तक तो ठीक-ठाक सरकारी जीवन लगता है।
लेकिन 1972 में जब वो IB यानी इंटेलिजेंस ब्यूरो में शामिल हुए, तब असली कहानी शुरू हुई।
भारत के असली धुरंधर की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही है: 1983 से 1987 तक, वो इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग में “कमर्शियल सेक्शन प्रमुख” के नाम पर तैनात थे। असली काम था पाकिस्तान की खुफिया गतिविधियों पर नजर रखना, और वो काम उन्होंने एक मुसलमान का वेश धरकर किया।
मस्जिदों में नमाज, स्थानीय बाजारों में खरीदारी, पाकिस्तानी नागरिकों से दोस्ती, और ISI के नेटवर्क की मैपिंग। उर्दू इतनी धाराप्रवाह थी कि पाकिस्तानी नागरिक भी शक नहीं करते थे।
एक मशहूर किस्सा है। लाहौर में एक दरगाह के बाहर एक बुजुर्ग मौलाना ने रोककर पूछा, “क्या आप हिंदू हैं?” किसी भी जासूस के लिए यह सवाल जानलेवा हो सकता था। डोभाल ने इतनी सहजता से जवाब दिया कि मौलाना संतुष्ट होकर चले गए।
इसी दौरान उन्होंने वो काम भी किया जो किसी जासूसी फिल्म से भी अजीब लगता है। एक नाई की दुकान से पाकिस्तानी परमाणु वैज्ञानिकों के बाल इकट्ठा किए। जब उनकी जाँच हुई तो यूरेनियम के संकेत मिले। दुनिया को पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम का पहला ठोस सुराग यहीं से मिला था। पकड़े जाते तो मौत तय थी।

ऑपरेशन ब्लैक थंडर: रिक्शावाला बनकर गोल्डन टेंपल में
1988। पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद अपने चरम पर। हरमंदिर साहिब (गोल्डन टेंपल) पर एक बार फिर आतंकवादियों ने कब्जा जमा लिया था। सरकार जानती थी कि बिना अंदर की जानकारी के कोई भी ऑपरेशन नाकाम होगा।
अजीत डोभाल ने एक पाकिस्तानी ISI एजेंट का वेश बनाया और रिक्शा चलाते हुए गोल्डन टेंपल परिसर में घुस गए। खालिस्तानी नेताओं से मिले। उनकी ताकत, पोजीशन, संख्या, हथियार, सब नोट किया। और बाहर आकर NSG को पूरी जानकारी दी।
इसी के आधार पर जो ऑपरेशन चला, वो ऑपरेशन ब्लैक थंडर-II था। आतंकवादी मारे गए, पवित्र स्थल को कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ। इस मिशन के लिए अजीत डोभाल को कीर्ति चक्र मिला, और वो यह पुरस्कार पाने वाले पहले पुलिस अधिकारी बने।
मिजोरम: जंगल में घुसकर विद्रोह तोड़ा
IB में शामिल होने के बाद डोभाल की पहली बड़ी तैनाती मिजोरम में हुई। 1972 का दशक। लालडेंगा की मिजो नेशनल फ्रंट चीन की मदद से अलग देश माँग रही थी।
भारत के असली धुरंधर ने म्यांमार के जंगलों में घुसकर और कभी-कभी चीनी इलाके में पहुँचकर MNF के नेटवर्क को समझा। फिर उन्होंने वो किया जो बंदूक नहीं कर सकती थी: MNF के सात बड़े कमांडरों में से छह को भारत की तरफ किया। जब लालडेंगा के अपने ही साथ छोड़ने लगे, तो वो 1986 में बातचीत की मेज पर आए। मिजोरम आज पूरे पूर्वोत्तर का सबसे शांत राज्य है।
कंधार: तालिबान से आँख मिलाकर बात
24 दिसंबर 1999। IC-814 हाईजैक। 190 यात्री। और विमान पहुँचा कंधार, जो उस वक्त तालिबान के कब्जे में था। वही तालिबान जिसे भारत ने कभी मान्यता नहीं दी थी।
“धुरंधर: द रिवेंज” में यह घटना परोक्ष रूप से दिखाई गई है। लेकिन असल में डोभाल उस बातचीत टीम में थे जिसने तालिबान और अपहर्ताओं से आठ दिन तक सीधे संवाद किया। 36 आतंकवादियों की माँग को घटाकर तीन तक लाना इसी बातचीत का नतीजा था। 160 से ज्यादा जिंदगियाँ बचीं।

NSA बनते ही बदल दी खेल की परिभाषा
2014 में प्रधानमंत्री मोदी ने अजीत डोभाल को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाया। यह पद पहले कागजी और सलाहकारी था। भारत के असली धुरंधर ने इसे ऑपरेशन कमांड सेंटर में बदल दिया।
उनके कार्यकाल की कुछ बड़ी घटनाएँ:
46 भारतीय नर्सें, इराक (2014): ISIS ने तिकरित में 46 भारतीय नर्सों को बंधक बना लिया। डोभाल खुद इराक गए, इराकी सरकार के उच्च अधिकारियों से मिले और 5 जुलाई 2014 को सभी नर्सें सुरक्षित घर पहुँचीं।
म्यांमार क्रॉस-बॉर्डर ऑपरेशन (2015): मणिपुर में जवान शहीद हुए। डोभाल और सेना प्रमुख ने मिलकर म्यांमार में घुसकर उग्रवादियों को निशाना बनाया।
सर्जिकल स्ट्राइक (2016): उरी हमले के बाद पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में की गई सर्जिकल स्ट्राइक की रणनीति का श्रेय बड़े पैमाने पर डोभाल को दिया जाता है। भारत की रक्षा नीति में यह ऐतिहासिक मोड़ था।
बालाकोट एयरस्ट्राइक (2019): पुलवामा के बाद 26 फरवरी को भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के अंदर जाकर जैश के कैंप तबाह किए। इस ऑपरेशन की जानकारी सिर्फ सात लोगों को थी, जिनमें डोभाल एक थे।
अनुच्छेद 370 का हटना (2019): जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने की पूरी रणनीतिक और सुरक्षा योजना डोभाल ने बनाई। इस ऑपरेशन में जो जमीनी तैयारी, खुफिया प्रबंधन और समन्वय हुआ, उसके पीछे उनका दिमाग था।

“डबल स्क्वीज”: जो पाकिस्तान को सबसे ज्यादा डराती है
अजीत डोभाल ने एक रणनीतिक सिद्धांत दिया है। सरल भाषा में: जो तुम्हें नुकसान पहुँचाए, उसे उसी के घर में दोगुना नुकसान पहुँचाओ।
उन्होंने एक सार्वजनिक भाषण में कहा था: “अब हम रक्षात्मक नहीं रहेंगे। दुश्मन को उसकी जमीन पर चुनौती दी जाएगी।”
यह “धुरंधर” फिल्म का वो डायलॉग नहीं है जो R. माधवन बोलते हैं। यह असली है। और 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर 2019 की बालाकोट तक, इस सिद्धांत को व्यवहार में उतारते देखा गया।
पुरस्कार: जो बिना शोर-शराबे के मिले
अजीत डोभाल के पुरस्कार कोई औपचारिक समारोह नहीं हैं। हर सम्मान के पीछे एक असली खतरा है।
- पुलिस मेडल फॉर मेरिटोरियस सर्विस (1974): सिर्फ छह साल की सेवा में, जबकि आमतौर पर 14 साल लगते हैं।
- कीर्ति चक्र (1989): ऑपरेशन ब्लैक थंडर के लिए। पहले पुलिस अधिकारी।
- NSA को कैबिनेट रैंक (2019): ऐसा पहले किसी NSA को नहीं मिला था।
- तीसरी बार NSA (2024): मोदी 3.0 में भी नियुक्ति। यह किसी भी NSA के लिए पहली बार था।

फिल्म बनाम असलियत: क्या मेल खाता है?
“धुरंधर” में R. माधवन का किरदार “अजय संयाल” IB का डायरेक्टर है, जो एक युवा जासूस को पाकिस्तान के अंडरवर्ल्ड में भेजता है। फिल्म में एक डायलॉग है जो बहुत चर्चा में रहा, “साक्ष्य संभाल कर रख, उम्मीद है कभी कोई नेता आएगा जो काम करेगा।”
यह डायलॉग 2008 की पृष्ठभूमि में है और 2014 का संकेत देता है। यह पूरी तरह राजनीतिक है, लेकिन इसकी जड़ उस सोच में है जो असल में डोभाल की रही है: नीति और ऑपरेशन को अलग मत रखो।
जो बातें फिल्म और असलियत में मेल खाती हैं: पाकिस्तान में अंडरकवर काम, IC-814 से प्रेरित हाईजैक की घटना, आतंकवाद और ISI के बीच की कड़ी।
जो फिल्मी है: रणवीर सिंह का किरदार एक composite है, कई असली एजेंटों से प्रेरित।
कश्मीर में जो काम बंदूक नहीं कर सकती थी
1990 का दशक कश्मीर में खून से लथपथ था। डोभाल को घाटी भेजा गया।
उन्होंने वो किया जो सेना के हजारों जवान मिलकर नहीं कर पाते। कुका पर्रे जैसे आतंकवादियों को मनाकर भारत की तरफ लाया। इन पूर्व आतंकवादियों को हथियार देकर कट्टरपंथियों के खिलाफ खड़ा किया। यह रणनीति विवादास्पद रही, लेकिन नतीजा था कि 1996 में कश्मीर में चुनाव हुए जो वर्षों से रुके हुए थे।
सिक्किम और मिथक जो इतिहास बन गए
1975 में सिक्किम का भारत में विलय एक राजनीतिक घटना के रूप में दर्ज है। लेकिन परदे के पीछे CIA, अमेरिकी प्रभाव और चीन की दिलचस्पी, सब कुछ था। डोभाल ने स्थानीय राजनीतिक नेताओं के साथ काम करते हुए जमीन तैयार की। आज सिक्किम भारत का सबसे साफ और शांत राज्य है।

मल्टी एजेंसी सेंटर: वो ढाँचा जो आज काम कर रहा है
2001 के बाद डोभाल ने मल्टी एजेंसी सेंटर (MAC) की नींव रखी। इसका काम था कि सभी खुफिया एजेंसियाँ, RAW, IB, मिलिट्री इंटेलिजेंस, एक प्लेटफॉर्म पर जानकारी साझा करें। यह भारत के आतंकवाद-विरोधी ढाँचे की आज भी रीढ़ है।
मिथक और सच: एक संतुलित नजरिया
अजीत डोभाल के बारे में जितनी कहानियाँ चलती हैं उनमें से सब पूरी तरह सत्यापित नहीं हैं। खुफिया ऑपरेशनों की प्रकृति ऐसी होती है कि आधिकारिक पुष्टि मुमकिन नहीं होती।
जो आधिकारिक रिकॉर्ड में है: पाकिस्तान तैनाती, कीर्ति चक्र, ऑपरेशन ब्लैक थंडर, कंधार वार्ता, मिजोरम, MAC की स्थापना।
जो व्यापक रूप से रिपोर्ट है लेकिन आधिकारिक रूप से अपुष्ट है: परमाणु बाल वाली कहानी, कुछ क्रॉस-बॉर्डर मिशन की बारीकियाँ।
फिल्म “धुरंधर” ने इन्हें रुपहले पर्दे पर उतारा है, जरूर देखिए। लेकिन असली कहानी इससे भी ज्यादा गहरी है।

पर्दे का धुरंधर और असली धुरंधर
“धुरंधर” फिल्म 3 घंटे 34 मिनट की है। “Dhurandhar: The Revenge” 3 घंटे 49 मिनट की। दोनों मिलाकर करीब साढ़े सात घंटे।
लेकिन अजीत डोभाल की असली कहानी 50 साल से भी लंबी है। कोई कैमरा नहीं, कोई बैकग्राउंड स्कोर नहीं, कोई तालियाँ नहीं। सिर्फ काम। और उस काम के नतीजे जो आज भारत की सुरक्षा नीति की बुनियाद हैं।
R. माधवन ने पर्दे पर जो जिया, वो असली अजीत डोभाल ने हाड़-मांस में जिया। लाहौर की गलियों में, मिजोरम के जंगलों में, गोल्डन टेंपल की दीवारों के भीतर, और कंधार की उस टेबल पर जहाँ तालिबान बैठा था।
भारत के असली धुरंधर आज 80 साल के हैं। तीसरी बार NSA। और अभी भी उतने ही सक्रिय।
फिल्म खत्म होने के बाद credits जरूर पढ़ना। उसमें “Inspired by real events” लिखा होगा। उस वक्त याद करना कि वो “real events” किसी फिल्मी किरदार ने नहीं, एक असली इंसान ने जिए थे।नोट: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी, समाचार रिपोर्टों और Wikipedia पर आधारित है। कुछ खुफिया ऑपरेशनों की बारीकियाँ आधिकारिक रूप से अपुष्ट हैं। “धुरंधर” फिल्म आदित्य धर द्वारा निर्देशित है और Jio Studios द्वारा निर्मित है।




