डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने आरक्षण सिर्फ 10 साल के लिए दिया था – यह बात कितनी सच है और असली सवाल क्या है?

हर साल लाखों बच्चे रात-रात जागकर पढ़ते हैं। माँ-बाप चाय की दुकान चलाते हैं, खेत में पसीना बहाते हैं, ताकि बच्चे की फीस भर सकें। और जब नतीजा आता है, 90% से ऊपर अंक लेकर भी कुछ बच्चे खाली हाथ रह जाते हैं। उन्हें बताया जाता है कि सीट नहीं है।

दूसरी तरफ, कम अंक पाने वाला बच्चा उसी कॉलेज में एडमिशन ले जाता है। फर्क सिर्फ जाति का होता है।

इस पर जब कोई सवाल उठाता है, तो जवाब मिलता है कि “यह बाबासाहेब का दिया आरक्षण है।” और जब कोई कहता है कि “डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने आरक्षण सिर्फ 10 साल के लिए दिया था,” तो बहस और गरम हो जाती है।

सच क्या है? डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर आरक्षण 10 साल का यह किस्सा पूरी तरह सही है या इसमें कुछ और भी है? इस लेख में वही बताएँगे, बिना किसी तरफदारी के।

पहले जानिए, वह “10 साल” वाली बात आई कहाँ से

जब भी आरक्षण की बात होती है, एक बात बहुत तेजी से फैलती है कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने खुद कहा था कि यह आरक्षण सिर्फ 10 साल के लिए है।”

यह बात पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन आधी-अधूरी जरूर है।

जब 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ, तो अनुच्छेद 334 में यह प्रावधान था कि लोकसभा और विधानसभाओं में SC और ST के लिए आरक्षित राजनीतिक सीटें पहले 10 साल तक रहेंगी।

यानी यह 10 साल की सीमा सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए थी, यानी संसद और विधानसभाओं की सीटों के लिए।

शिक्षा और सरकारी नौकरी में जो आरक्षण है, उसकी कोई समय-सीमा संविधान में नहीं रखी गई थी। यह बात बहुत कम लोग जानते हैं।

तो जब आप किसी से सुनते हैं कि “डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर आरक्षण 10 साल के लिए दिया था,” तो यह आधा सच है। राजनीतिक सीटों के लिए 10 साल की बात थी, नौकरी और शिक्षा के लिए नहीं।

भारत का संविधान

फिर उन 10 सालों का क्या हुआ?

संविधान सभा की बहसों में ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष ने खुद माना था कि वे व्यक्तिगत रूप से इससे ज्यादा लंबी समय-सीमा चाहते थे, लेकिन तब के लिए 10 साल तय किया गया। साथ ही यह भी कहा गया था कि अगर बाद में जरूरत हो तो संसद संविधान संशोधन से इसे बढ़ा सकती है।

और यही हुआ। बार-बार हुआ।

  • 8वें संशोधन से 1960 की सीमा बढ़ाकर 1970 की गई।
  • 23वें संशोधन से 1980 तक बढ़ाई गई।
  • 45वें संशोधन से 1990 तक।
  • 62वें संशोधन से 2000 तक।
  • 79वें संशोधन से 2010 तक।
  • 95वें संशोधन से 2020 तक।
  • और 104वें संशोधन (2019) से अब यह 2030 तक बढ़ा दी गई है।

यानी जो डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर आरक्षण 10 साल की शुरुआती सीमा थी, वह हर दशक में नेताओं ने बढ़ाते रहे। अब तक 75 साल हो चुके हैं, और 2030 तक और चलेगा।

क्यों बढ़ाते रहे? क्योंकि इसमें राजनीतिक फायदा था। वोट मिलते थे।

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बाबासाहेब खुद क्या चाहते थे?

यहाँ एक बहुत जरूरी बात है जो अक्सर नजरअंदाज हो जाती है।

1951 में पंजाब में एक भाषण में बाबासाहेब ने जिक्र किया था कि SC/ST के लिए राजनीतिक सीटों का आरक्षण एक अस्थायी प्रावधान है। उनकी सोच यह थी कि जब तक सामाजिक भेदभाव और असमानता की असली जड़ें खत्म न हों, तब तक इस तरह के उपाय रहें।

लेकिन इसे राजनीतिक वोटों के लिए हर 10 साल पर बिना किसी समीक्षा के बढ़ाते रहना, यह उनकी मंशा नहीं थी।

बाबासाहेब एक अर्थशास्त्री, विधिवेत्ता और समाज सुधारक थे। उन्होंने कोलंबिया यूनिवर्सिटी और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़ाई की। उन्होंने खुद दलित परिवार में जन्म लेकर, अपमान सहकर, यह मुकाम हासिल किया था। उनका सपना एक ऐसा भारत था जहाँ जाति की कोई भूमिका न हो। इसीलिए उन्होंने बाद में हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाया, क्योंकि वे जाति व्यवस्था को जड़ से खत्म करना चाहते थे।

उनकी पहचान को सिर्फ “आरक्षण देने वाले नेता” तक सीमित करना उनके साथ घोर अन्याय है।

तो आरक्षण क्यों दिया गया था? यह समझना जरूरी है

आजादी के बाद भारत के सामने एक बड़ी चुनौती थी। सदियों से दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों को पढ़ने नहीं दिया गया था। उन्हें अच्छी नौकरी नहीं मिलती थी। उन्हें समाज में बराबरी का दर्जा नहीं था।

एक उदाहरण से समझिए: एक दौड़ हो रही है। कुछ लोगों के पाँव में जंजीरें बंधी हैं। बाकी लोग आजाद हैं। अब अगर जंजीरें खोल दो और कहो “ठीक है, अब दौड़ो, सब बराबर हैं” तो क्या यह सच में बराबरी होगी? नहीं।

बाबासाहेब ने यही सोचा। उन्होंने कहा कि इन वर्गों को थोड़ी मदद चाहिए, तब तक जब तक ये बराबरी पर नहीं आ जाते।

यह एक सही और जरूरी फैसला था। उस वक्त की जरूरत था।

लेकिन 75 साल बाद, जब देश बदल चुका है, परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं, जब कई वर्गों के लोग मुख्यधारा में आ चुके हैं, तो क्या बिना किसी समीक्षा के यही व्यवस्था जस की तस चलाना उचित है?

संविधान

असली समस्या क्या है? तीन उदाहरणों से समझिए

उदाहरण 1: NEET और डॉक्टर बनने का सपना

NEET परीक्षा में qualifying cutoff के आँकड़े हर साल सार्वजनिक होते हैं। सरकारी medical college में General category को लगभग 600+ अंक चाहिए होते हैं, जबकि SC/ST category के लिए यह सीमा काफी कम होती है।

एक General category का बच्चा जो 590 अंक लाता है, बाहर रह सकता है। एक SC category का बच्चा जो 480 अंक लाता है, उसी कॉलेज में सीट पा सकता है।

दोनों डॉक्टर बनेंगे। एक ही अस्पताल में काम करेंगे। एक ही मरीज देखेंगे। यहाँ सवाल यह नहीं कि Reserved category का बच्चा काबिल नहीं है। सवाल यह है कि जब दोनों को एक जैसी जिम्मेदारी संभालनी है, तो तैयारी का पैमाना इतना अलग क्यों? और जो बच्चा बाहर रहा, उसके माँ-बाप को क्या जवाब दें?

उदाहरण 2: IIT में दाखिला

JEE Advanced में General category के लिए top rank की सीमा और SC/ST category के लिए उसी IIT में उसी branch की सीमा में बड़ा फर्क होता है। यानी एक ही संस्थान में दो अलग-अलग मानकों पर छात्र चुने जाते हैं।

मेहनत करने वाले General category के बच्चे का सपना टूटता है, जबकि उससे कम rank पर Reserved category का बच्चा वही सीट पाता है। यह एक वाजिब सवाल खड़ा करता है जिसका जवाब जाति-आधारित व्यवस्था के पास नहीं है।

उदाहरण 3: एक IAS अधिकारी का बेटा

एक IAS अधिकारी हैं। उनकी जाति SC में आती है। उनकी मासिक तनख्वाह अच्छी है। बच्चे निजी स्कूल में पढ़ते हैं। महँगी coaching लेते हैं। घर पक्का है।

लेकिन जाति SC है, इसलिए उस बेटे को आरक्षण का पूरा फायदा मिलेगा।

दूसरी तरफ, एक गरीब सवर्ण किसान का बेटा जो खेत में काम करके पढ़ता है, जिसके घर में ठीक से रोशनी भी नहीं है, उसकी सालाना पारिवारिक आमदनी डेढ़ लाख रुपए से कम है। उसे कोई अतिरिक्त मदद नहीं मिलती।

क्या यह बाबासाहेब का सपना था? बिल्कुल नहीं। उन्होंने वंचितों की मदद के लिए आरक्षण दिया था, संपन्नों को अतिरिक्त फायदा देने के लिए नहीं।

आरक्षण गरीबी देखे, जाति नहीं — यह सिर्फ नारा नहीं, जरूरत है

यह बात सुनने में सीधी लगती है, लेकिन इसके पीछे एक बहुत बड़ी और असहज सच्चाई है जिसे राजनीति अब तक छुपाती आई है।

आज भारत में गरीबी किसी एक जाति की बपौती नहीं है। गरीब हर जगह हैं, हर जाति में हैं। लेकिन सरकारी मदद अभी भी जाति का टिकट देखकर मिलती है, जरूरत नहीं।

एक गाँव, दो परिवार, एक अन्याय

विदर्भ के एक छोटे से गाँव में दो परिवार रहते हैं।

पहला परिवार SC जाति का है। घर का मुखिया पिछले 20 साल से सरकारी नौकरी में है। बच्चे निजी स्कूल में पढ़ते हैं। घर पक्का है। लेकिन जाति SC है, इसलिए बेटे को कॉलेज और सरकारी नौकरी में आरक्षण का पूरा फायदा मिलेगा।

दूसरा परिवार सवर्ण जाति का है। घर का मुखिया छोटा किसान है। खेत पर कर्ज है। बेटा सरकारी स्कूल में पढ़ता है। परिवार की सालाना आमदनी डेढ़ लाख रुपए से भी कम है। लेकिन जाति सवर्ण है, इसलिए कोई अतिरिक्त मदद नहीं।

कागज पर यह आरक्षण दिखता है। असल जिंदगी में यह अन्याय है।

सबसे जरूरी बात: असली गरीब दलित को भी नुकसान हो रहा है

यह section सिर्फ सवर्ण गरीबों के बारे में नहीं है। यह उस दलित बच्चे के बारे में भी है जिसके लिए बाबासाहेब ने यह व्यवस्था बनाई थी।

जब एक संपन्न SC परिवार का बच्चा आरक्षित सीट ले जाता है, तो वह सीट उस गरीब दलित बच्चे से भी छिन जाती है जो एक कच्चे घर में रहता है और एक वक्त के खाने के लिए संघर्ष करता है।

एक उदाहरण: NEET में दो बच्चे हैं। दोनों SC जाति के हैं।

पहला नागपुर शहर का है। पिता एक सरकारी अधिकारी हैं। बच्चे ने महँगी coaching ली। 540 अंक आए।

दूसरा यवतमाल जिले के एक दूरदराज गाँव का है। माँ मजदूर है। सरकारी स्कूल में पढ़ा। 490 अंक आए।

SC quota में जो सीट थी, वह पहले बच्चे को मिली क्योंकि उसके अंक ज्यादा हैं।

दूसरा बच्चा, जो सच में वंचित था, बाहर रह गया।

यह वह बच्चा है जिसके लिए बाबासाहेब ने लड़ाई लड़ी थी। और आज वही सबसे ज्यादा नुकसान में है।

आंबेडकर संविधान

क्रीमी लेयर: जो हुआ और जो अभी बाकी है

OBC आरक्षण में “क्रीमी लेयर” का नियम 1992 में इंद्रा साहनी बनाम भारत सरकार के ऐतिहासिक फैसले के बाद लागू हुआ। इसके तहत जिन OBC परिवारों की सालाना आमदनी 8 लाख रुपए से ज्यादा है, उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलता।

यह एक सही कदम था।

लेकिन SC और ST में यह नियम अब तक लागू नहीं है।

हालाँकि, अगस्त 2024 में एक बड़ा बदलाव आया। सुप्रीम कोर्ट की सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 6:1 के बहुमत से State of Punjab v. Davinder Singh मामले में यह फैसला दिया कि राज्य सरकारें SC/ST में उप-वर्गीकरण यानी sub-classification कर सकती हैं, ताकि इन वर्गों के सबसे पिछड़े और जरूरतमंद लोगों तक आरक्षण का लाभ पहुँचे।

इसी फैसले में न्यायमूर्ति बी.आर. गवई ने यह भी कहा कि SC/ST में भी क्रीमी लेयर की पहचान करके संपन्न लोगों को आरक्षण के लाभ से बाहर किया जाना चाहिए, क्योंकि यही असली संवैधानिक बराबरी है।

यह एक साहसी और सही दिशा में उठाया गया कदम था। लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते इस पर अमल अभी भी नहीं हो पाया है।

आरक्षण गरीबी देखे तो क्या होगा?

अगर आरक्षण गरीबी के आधार पर दिया जाए तो:

पहली बात, जो परिवार तीन पीढ़ियों से सरकारी नौकरी में हैं और आर्थिक रूप से मजबूत हो चुके हैं, उनके बच्चों की बजाय वह मदद उस बच्चे को मिलेगी जिसे सच में जरूरत है।

दूसरी बात, एक गरीब दलित, एक गरीब सवर्ण, एक गरीब मुस्लिम और एक गरीब आदिवासी, सभी को समान अवसर मिलेगा। यह एक ऐसी व्यवस्था होगी जो जाति से नहीं, इंसानियत से चलेगी।

तीसरी बात, धीरे-धीरे जातिवाद की जड़ें कमजोर होंगी, क्योंकि लोग जाति से नहीं, जरूरत के नाम पर एकजुट होंगे।

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एक सही कदम जो उठाया गया, लेकिन काफी नहीं

2019 में संविधान के 103वें संशोधन के जरिए EWS यानी Economically Weaker Section के लिए 10% आरक्षण का प्रावधान किया गया। यह उन सामान्य वर्ग के लोगों के लिए है जो SC, ST या OBC में नहीं आते और जिनकी वार्षिक पारिवारिक आमदनी 8 लाख रुपए से कम है।

नवंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट की पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने 3:2 के बहुमत से EWS आरक्षण को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया।

यह एक सही दिशा में उठाया गया कदम था। गरीब सवर्ण परिवारों को पहली बार कोई सहायता मिली।

लेकिन यहाँ एक बड़ी खामी है। EWS में 8 लाख की आय सीमा पूरे देश के लिए एक जैसी है। मुंबई में 8 लाख और यवतमाल के एक गाँव में 8 लाख की जीवन-स्तर में जमीन-आसमान का फर्क है। यह सीमा राज्य और क्षेत्र के अनुसार तय होनी चाहिए।

और सबसे जरूरी बात: EWS एक शुरुआत है, लेकिन पूरी व्यवस्था को इसी दिशा में ले जाना होगा।

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर संविधान

नेता यह क्यों नहीं बदलते?

सीधा जवाब है: वोट।

जिस दिन कोई नेता कहेगा कि “जाति के आधार पर आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए,” उस दिन उसके वोट जाएंगे। इसलिए सब चुप रहते हैं। बल्कि और जातियों को जोड़ते जाते हैं।

लेकिन इस चुप्पी की कीमत कौन चुकाता है? वह बच्चा जो रात भर जागकर पढ़ता है और फिर भी खाली हाथ रहता है। वह गरीब दलित बच्चा भी, जिसकी सीट कोई संपन्न “Reserved” परिवार का बच्चा ले जाता है।

तो क्या होना चाहिए?

आरक्षण की जरूरत है। इस बात से कोई इनकार नहीं। जो सच में पिछड़े हैं, जिन्हें अवसर नहीं मिला, उन्हें मदद मिलनी चाहिए। लेकिन वह मदद जरूरत देखकर मिले, जाति का टिकट देखकर नहीं।

पहला: SC और ST में भी क्रीमी लेयर लागू होनी चाहिए। 2024 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला इसी दिशा में था। सरकार को इसे अमल में लाना चाहिए।

दूसरा: आरक्षण की समीक्षा हर 10 साल में होनी चाहिए। कौन सी जाति अब सच में वंचित है, कौन सी आगे आ चुकी है, यह डेटा के आधार पर तय होना चाहिए, वोट बैंक के आधार पर नहीं।

तीसरा: EWS की 8 लाख की आय सीमा को राज्य और क्षेत्र के हिसाब से अलग-अलग तय किया जाना चाहिए।

चौथा: सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता इतनी अच्छी हो कि कोई भी गरीब बच्चा, चाहे किसी भी जाति का हो, बिना महँगी coaching के भी प्रतियोगी परीक्षाओं में टिक सके। क्योंकि जब अवसर सच में बराबर हों, तब आरक्षण की जरूरत अपने आप कम होती जाएगी।

बाबासाहेब का असली सपना क्या था?

डॉ. भीमराव रामजी डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को सिर्फ “आरक्षण देने वाले नेता” कहना उनके साथ घोर अन्याय है।

वे उस दौर में पले-बढ़े जब दलित बच्चों को स्कूल में अलग बैठाया जाता था। पानी पीने के लिए उन्हें उस घड़े को छूने नहीं दिया जाता था जिसे बाकी बच्चे छूते थे। उसी पीड़ा से गुजरे बाबासाहेब ने दुनिया के बड़े विश्वविद्यालयों से पढ़ाई की और पूरे देश का संविधान लिखा।

उनका सपना एक ऐसा भारत था जहाँ जाति का कोई अस्तित्व न हो। जहाँ हर इंसान को उसकी मेहनत और योग्यता का फल मिले।

जो लोग उनके नाम पर जाति आधारित आरक्षण को बिना किसी समीक्षा के अनंत काल तक चलाना चाहते हैं, वे बाबासाहेब का सम्मान नहीं कर रहे। वे उनके नाम का राजनीतिक इस्तेमाल कर रहे हैं।

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर आरक्षण 10 साल की बात आधी सच थी। लेकिन पूरा सच यह है कि उन्होंने जो भी दिया, वह एक वंचित भारत को एक बराबर मौका देने के लिए दिया था, न कि एक ऐसी व्यवस्था बनाने के लिए जो खुद अन्याय का हथियार बन जाए।

आखिरी बात

यह लेख किसी जाति के खिलाफ नहीं है।

यह उस राजू के लिए है जो 92% लाकर भी रोता है।

यह उस गरीब दलित बच्चे के लिए भी है जिसे सच में मदद चाहिए, लेकिन जिसकी जगह कोई संपन्न परिवार का बच्चा ले जाता है।

यह उस माँ के लिए है जो बेटे की फीस के लिए गहने बेचती है, चाहे वह किसी भी जाति की हो।

और यह उस देश के लिए है जो बाबासाहेब के सपनों का भारत बन सकता है, अगर हम सच में और ईमानदारी से सोचें।

आरक्षण गरीबी देखे, जाति नहीं।

मदद उसे मिले जिसे जरूरत हो। यही बाबासाहेब चाहते थे। यही भारत को चाहिए।

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