Oxfam की रिपोर्ट कहती है — अरबपति आम लोगों से 4,000 गुना ज्यादा बार सत्ता में आते हैं। भारत और दुनिया में पैसे और राजनीति का यह खेल आखिर कब तक?
Oxfam की January 2025 रिपोर्ट ने एक संख्या सामने रखी है जो पढ़ते ही आप रुक जाते हैं: 4,000।
यही वो गुणाँक है जिससे एक अरबपति के राजनीतिक पद पाने की संभावना, आम नागरिक से ज्यादा होती है। चार हजार गुना। सोचिए — जब आप अपनी मेहनत की कमाई से घर चला रहे हैं, तो उसी वक्त दुनिया के कुछ लोग अपनी संपत्ति से देश चला रहे हैं।
यह कोई conspiracy theory नहीं है। यह Oxfam का डेटा है, जो World Economic Forum के Davos summit के ठीक पहले जारी हुआ। और यह सिर्फ अमेरिका की बात नहीं — भारत की कहानी तो और भी चौंकाने वाली है।
तो सवाल यह है: क्या लोकतंत्र सच में “जनता की, जनता के लिए, जनता द्वारा” है? या यह सिर्फ एक खूबसूरत नारा रह गया है?
वो 4,000 का आंकड़ा — आया कहाँ से?
January 2025 में Oxfam International ने अपनी वार्षिक असमानता रिपोर्ट जारी की — “Resisting the Rule of the Rich.” इस रिपोर्ट का एक तथ्य दुनिया भर में फैल गया: अरबपति, आम नागरिकों की तुलना में 4,000 गुना ज्यादा बार राजनीतिक पद पर काबिज होते हैं।
यह सिर्फ एक ratio नहीं है। यह एक पूरी व्यवस्था की तस्वीर है। दुनिया में कुल अरबपतियों की संख्या 2025 में पहली बार 3,000 के पार गई। इनकी कुल संपत्ति 18.3 ट्रिलियन डॉलर पहुंच गई — जो पिछले पांच साल के औसत से तीन गुना तेज गति से बढ़ी।
Northwestern University के एक अलग शोध ने पाया कि दुनिया के 11% अरबपतियों ने कभी न कभी राजनीतिक पद हासिल किया है या उसकी कोशिश की है। यह प्रतिशत आम जनता में करीब 0.003% है।
Oxfam के कार्यकारी निदेशक Amitabh Behar के शब्दों में: बढ़ती आर्थिक खाई के साथ-साथ एक राजनीतिक खाई भी बन रही है, जो बेहद खतरनाक है। यह खाई लोकतंत्र की नींव को कमजोर कर रही है।
World Values Survey ने 66 देशों में एक सवाल पूछा: “क्या आपके देश में अमीर लोग चुनाव खरीद लेते हैं?” जवाब चौंकाने वाला था — करीब आधी दुनिया ने “हाँ” कहा।

अमेरिका: जहाँ 1 डॉलर = 1 वोट जैसा हो गया
2004 में अमेरिका के 100 सबसे अमीर लोगों ने चुनाव में कुल 4.6 करोड़ डॉलर लगाए। 2024 में वही संख्या 100 करोड़ डॉलर से ऊपर पहुंच गई। यानी 20 साल में 21 गुना बढ़ोतरी।
Washington Post की पड़ताल के अनुसार Forbes की 2025 List के 902 अमेरिकी अरबपतियों में से कम से कम 44 अरबपति या उनके जीवनसाथी पिछले दस साल में किसी न किसी राज्य या केंद्रीय पद पर नियुक्त हो चुके हैं।
Elon Musk ने 2024 के चुनाव में करीब 13.2 करोड़ डॉलर Donald Trump और Republican Party के लिए खर्च किए। वे दुनिया के सबसे अमीर इंसान हैं और आज अमेरिकी सरकार के भीतर DOGE (Department of Government Efficiency) जैसी संस्था चला रहे हैं।
यहाँ सोचने वाली बात है — जिस व्यक्ति की कंपनियाँ सरकारी contracts पर निर्भर हैं, वही व्यक्ति सरकार की नीतियाँ बना रहा है। क्या यह हितों का टकराव नहीं?
2010 में Citizens United vs. FEC के ऐतिहासिक फैसले ने बड़ी कंपनियों और अमीरों को असीमित पैसा चुनावों में लगाने की अनुमति दे दी। उस फैसले के बाद से political funding का नक्शा पूरी तरह बदल गया।
भारत: गरीब देश, अमीर नेता – यह विरोधाभास क्यों?
अब जरा भारत की तरफ देखते हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में Association for Democratic Reforms (ADR) का डेटा कहता है: चुनाव जीतने वाले 93% सांसद करोड़पति हैं।
इनकी औसत संपत्ति करीब 7.5 करोड़ रुपए है। जबकि एक औसत शहरी भारतीय परिवार की संपत्ति करीब 28 लाख रुपए। यानी हमारे सांसद औसत शहरी भारतीय से 27 गुना ज्यादा अमीर हैं।
ADR का एक और तथ्य: 1 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति वाले उम्मीदवारों के जीतने की संभावना उनसे 28 गुना ज्यादा होती है जिनके पास इससे कम संपत्ति है।
2024 के लोकसभा चुनाव में कुल खर्च अनुमानित रूप से 1 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा रहा — जो 2019 के मुकाबले करीब दोगुना है। Centre for Media Studies के अनुसार हर वोट पर औसत खर्च 1,400 रुपए था।
जरा सोचिए — बिहार में एक आम नागरिक की सालाना आय करीब 54,000 रुपए है। और एक लोकसभा चुनाव लड़ने का न्यूनतम खर्च 50 से 100 लाख रुपए। यह दरवाजा पहले से ही बंद है, जब तक आपके पास संपत्ति न हो।
भारत में Electoral Bonds का मुद्दा भी इसी तस्वीर का हिस्सा है। 2024 में Supreme Court ने Electoral Bonds को असंवैधानिक करार दिया। इससे पहले 2004-05 से 2022-23 तक छह बड़ी राजनीतिक पार्टियों को मिले कुल चंदे का 60% यानी करीब 19,083 करोड़ रुपए अज्ञात स्रोतों से आया था।

तो अरबपति राजनीति में आते क्यों हैं?
यह सवाल बड़ा दिलचस्प है। क्या वे सच में सेवा करने आते हैं? या कुछ और है?
Northwestern University के शोधकर्ता Daniel Krcmaric और Stephen Nelson ने इस पर गहराई से काम किया। उनकी खोज के मुताबिक अरबपतियों के राजनीति में आने के पीछे तीन बड़े कारण होते हैं:
- Tax Policy: 2017 में अमेरिका में जो Tax Cuts Act आया, वह सबसे ज्यादा अमीरों के लिए फायदेमंद था। जो नेता उस नीति को बनाते हैं, वे खुद उससे सबसे ज्यादा लाभ उठाते हैं।
- Regulation: Elon Musk की कई कंपनियाँ जैसे Tesla, SpaceX — सरकारी नियामकों और contracts पर निर्भर हैं। सत्ता के करीब रहने से इन मोर्चों पर सुविधा मिलती है।
- Trade Policy: Tariffs और import-export नीतियाँ सीधे बड़े उद्योगपतियों की कंपनियों को प्रभावित करती हैं। नीति बनाने में हिस्सा होने से फायदा है।
भारत में भी यह pattern साफ दिखता है। जो उद्यमी परिवारों से जुड़े नेता हैं, उनके कार्यकाल में उनकी कंपनियों की growth राष्ट्रीय औसत से कई गुना ज्यादा रही — यह ADR और Asia Times की पड़ताल में सामने आया है।
राजनीति अब सेवा नहीं, एक investment बन गई है। और यह investment सबसे ज्यादा returns देती है।
Media: जब अरबपति खबरें भी तय करें
Oxfam की रिपोर्ट में एक और चौंकाने वाला तथ्य है: दुनिया की आधे से ज्यादा बड़ी media companies अरबपतियों के हाथ में हैं। और सभी प्रमुख social media platforms — Facebook, X (Twitter), YouTube — किसी न किसी अरबपति के नियंत्रण में हैं।
जब Elon Musk ने X को खरीदा, तो एक University of California के अध्ययन के मुताबिक उसके बाद कुछ ही महीनों में platform पर hate speech 50% बढ़ गई। X का उपयोग केन्या जैसे देशों में सरकारी आलोचकों की निगरानी और दमन के लिए भी हुआ।
जब एक ही व्यक्ति सबसे बड़ी social media company चलाए और साथ में सरकार की नीतियाँ भी बनाए — तो क्या लोकतंत्र में “free speech” का मतलब बचता है?

आम आदमी का वोट — कितना असरदार?
यहाँ एक जरूरी सवाल उठता है: अगर पैसा ही सत्ता तय करता है, तो हमारे वोट का क्या मतलब?
जवाब complicated है, लेकिन निराशाजनक नहीं। वोट अभी भी ताकतवर है — लेकिन तभी जब नागरिक जागरूक हों। History गवाह है कि पैसे से लड़ी और जीती गई क्रांतियाँ कम हुई हैं, लेकिन जागरूक जनता ने बड़े बदलाव जरूर किए हैं।
भारत में RTI (Right to Information), Supreme Court का Electoral Bonds पर फैसला, और ADR जैसी संस्थाओं का काम — यह सब जनता की माँग से ही हुआ।
असल सवाल यह है कि हम कब तक यह मान लें कि “ऐसे ही होता है”? या हम यह पूछना शुरू करें कि हमारा नेता किसके पैसे से जीता है, और वह किसकी नीतियाँ बनाएगा?
Key Facts — एक नज़र में
- Oxfam 2025: अरबपती आम नागरिकों से 4,000 गुना ज्यादा बार राजनीतिक पद पाते हैं।
- दुनिया में 3,000+ अरबपति; कुल संपत्ति $18.3 Trillion — जो नीचे 4.1 अरब लोगों की संपत्ति के बराबर है।
- 2024 के अमेरिकी चुनाव में Top-100 अमीरों ने 1 Billion डॉलर से ज्यादा खर्च किए।
- भारत में 2024 लोकसभा के 93% जीते हुए सांसद करोड़पति हैं (ADR)।
- 1 करोड़ से ज्यादा संपत्ति वाले उम्मीदवार, कम संपत्ति वालों से 28 गुना ज्यादा बार जीतते हैं।
- 2024 लोकसभा चुनाव: अनुमानित खर्च 1 लाख करोड़+ रुपए — प्रति वोट 1,400 रुपए।
- दुनिया के 66 देशों में लगभग 50% लोगों का मानना है कि उनके देश में अमीर चुनाव खरीद लेते हैं।
लोकतंत्र बचाना है तो सवाल पूछना होगा
- Gandhi और Shastri के जमाने में भारतीय राजनीति में पैसा नहीं, विचार चलता था। आज लोकसभा की सीट जीतने का न्यूनतम खर्च 50 लाख रुपए से शुरू होता है — और आम आदमी की पहुँच से बाहर है।
- यह कहना गलत होगा कि सारे अमीर नेता बुरे होते हैं। लेकिन यह सवाल पूछना जरूरी है: जब सत्ता में आने के लिए ही करोड़ों चाहिए, तो उस सत्ता का इस्तेमाल किसके लिए होगा?
- Asia Times ने इसे “democratic paradox” कहा — एक गरीब मतदाता का देश, जिसे अमीर प्रतिनिधि चलाते हैं।
“एक सच्चे लोकतंत्र की पहचान उसके नेताओं की संपत्ति से नहीं, बल्कि इससे होती है कि वे कितने गरीबों की नुमाइंदगी करते हैं।”
जागरूक नागरिक होने का मतलब है — अपने उम्मीदवार का election affidavit पढ़ना, पूछना कि उसका चुनावी चंदा कहाँ से आया, और यह समझना कि वोट एक ताकत है — जिसे कोई खरीद नहीं सकता, अगर हम खुद न बेचें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
Q1. अरबपति 4,000 गुना ज्यादा नेता बनते हैं — यह डेटा कहाँ से आया?
यह आँकड़ा Oxfam International की January 2025 की रिपोर्ट ‘Resisting the Rule of the Rich’ से है, जो Davos World Economic Forum से ठीक पहले जारी हुई। इसमें दुनिया के कई देशों के political data का विश्लेषण किया गया।
Q2. भारत में कितने सांसद करोड़पति हैं?
Association for Democratic Reforms (ADR) के 2024 के आंकड़ों के अनुसार लोकसभा में जीते 93% सांसद करोड़पति हैं, जिनकी औसत घोषित संपत्ति करीब 7.5 करोड़ रुपए है।
Q3. क्या अमीर नेता होना गलत है?
जरूरी नहीं। समस्या यह है कि जब सत्ता में आने के लिए ही करोड़ों खर्च होते हैं, तो यह system आम नागरिकों के लिए बंद हो जाता है। असली सवाल wealth का नहीं, representation का है।
Q4. Electoral Bonds क्या था और इसे क्यों बंद किया गया?
Electoral Bonds एक scheme थी जिसमें कंपनियाँ anonymously राजनीतिक पार्टियों को चंदा दे सकती थीं। Supreme Court ने February 2024 में इसे असंवैधानिक घोषित किया क्योंकि इससे नागरिकों के ‘जानने के अधिकार’ का उल्लंघन होता था।
Q5. क्या आम नागरिक राजनीति में आ सकते हैं?
कानूनन हाँ, व्यवहार में बहुत मुश्किल है। Lok Sabha का न्यूनतम चुनावी खर्च 50-95 लाख रुपए है (सिर्फ official limit)। असल खर्च कहीं ज्यादा होता है। RTI, community organizing, और grassroots politics इसके कुछ विकल्प हैं।
अब बारी आपकी है
अगर यह article आपको सोचने पर मजबूर कर गया — तो यही इसकी सफलता है।
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नीचे comment में बताएं: क्या आपने कभी अपने सांसद या विधायक की संपत्ति चेक की है?
महत्वपूर्ण टिप्पणी और अस्वीकरण
यह लेख Oxfam 2025, ADR India और अन्य सार्वजनिक स्रोतों पर आधारित है। यह किसी दल या व्यक्ति विशेष के पक्ष या विरोध में नहीं है। आँकड़े लेखन तिथि तक सटीक हैं — मूल स्रोतों से स्वयं पुष्टि करें। लेखक किसी भी निर्णय के लिए उत्तरदायी नहीं है।




