संत कूर्मदास की सच्ची कहानी जिन्होंने बिना हाथ-पैर के रेंगते हुए पंढरपुर की यात्रा की और भगवान विठ्ठल स्वयं उनसे मिलने लहुळ गाँव आए। जानिए इस अद्भुत भक्ति गाथा को विस्तार से।
क्या आपने कभी सोचा है कि भक्ति में कितनी शक्ति होती है?
आज जब हम छोटी-छोटी मुश्किलों में घुटने टेक देते हैं, तब एक ऐसी कहानी है जो हमें सिखाती है कि अगर मन में सच्ची लगन हो तो कुछ भी असंभव नहीं। यह कहानी है संत कूर्मदास की, जिनके पास न हाथ थे न पैर, लेकिन उनकी भक्ति इतनी प्रबल थी कि खुद भगवान विठ्ठल उनसे मिलने चलकर आए।
यह कहानी केवल 400 साल पुरानी नहीं, बल्कि आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। आइए जानते हैं संत कूर्मदास की इस अद्भुत यात्रा के बारे में, जो महाराष्ट्र के लहुळ गाँव में आज भी जीवित है।
कौन थे संत कूर्मदास?
संत कूर्मदास महाराष्ट्र के पैठण नामक गाँव के रहने वाले थे। यह घटना लगभग 400 साल पहले की है, जब महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन अपने चरम पर था। कूर्मदास का जन्म एक असाधारण परिस्थिति में हुआ था, वे जन्म से ही विकलांग थे। उनके न तो हाथ थे और न ही पैर।
आप सोच सकते हैं कि ऐसी स्थिति में उनका जीवन कितना कठिन रहा होगा। वे जहाँ भी पड़े रहते, लोग जो कुछ खिला देते उसी से उनका गुजारा होता था। लेकिन कूर्मदास ने कभी हार नहीं मानी। वे पेट के बल रेंगते हुए गाँव के मंदिर में कीर्तन सुनने जाया करते थे।

भगवान विठ्ठल से पहली मुलाकात
एक दिन गाँव के मंदिर में हरिदास नामक एक संत का कीर्तन हो रहा था। कूर्मदास रेंगते हुए वहाँ पहुँचे और भगवान विठ्ठल की लीलाओं को सुनकर मंत्रमुग्ध हो गए। हरिदासजी ने पंढरपुर के विठ्ठल मंदिर का अलौकिक महिमा बताया। उन्होंने कहा कि कार्तिक मास की एकादशी के दिन पंढरपुर में भगवान के दर्शन करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
बस, उसी दिन कूर्मदास के मन में एक संकल्प जागा। उन्होंने ठान लिया कि चाहे जो हो जाए, वे एकादशी के दिन पंढरपुर जाकर अपने विठ्ठल के दर्शन जरूर करेंगे।
असंभव यात्रा की शुरुआत
जब कूर्मदास ने पंढरपुर जाने की बात की, तो लोगों ने उन्हें समझाया कि यह असंभव है। पैठण से पंढरपुर की दूरी बहुत ज्यादा थी और बिना हाथ-पैर के यह यात्रा करना किसी चमत्कार से कम नहीं था।
लेकिन कूर्मदास ने किसी की नहीं सुनी। उन्होंने भगवान विठ्ठल का नाम लिया और पेट के बल रेंगते हुए पंढरपुर की दिशा में चल पड़े। वे दिन भर में सिर्फ एक कोस (लगभग 3 किलोमीटर) ही आगे बढ़ पाते थे। उनके शरीर पर घाव हो जाते, लेकिन उनकी आस्था अडिग थी।
रास्ते में विठोबा की कृपा
कूर्मदास की इस भक्ति को देखकर भगवान विठ्ठल का मन द्रवित हो गया। एक दिन जब कूर्मदास थके-हारे रास्ते में पड़े थे, तभी वहाँ एक व्यापारी आया। उसने घोड़े से उतरकर कूर्मदास से पूछा, ‘भाई, तुम्हारे हाथ-पैर नहीं हैं, फिर तुम यहाँ कैसे आ गए?’
कूर्मदास ने कहा, ‘मेरा नाम कूर्मदास है। मैं पंढरपुर जा रहा हूँ, अपने विठ्ठल के दर्शन करने।’
वह व्यापारी मुस्कुराया और बोला, ‘अच्छा हुआ, मुझे भी साथ मिल गया। मेरा नाम विठोबा खिस्ती है। मैं गाँव-गाँव जाकर व्यापार करता हूँ और पंढरपुर में मेरी एक दुकान है। आज रात यहीं रुकते हैं, कल साथ चलेंगे।’
उस रात विठोबा ने कूर्मदास के लिए खाना बनाया, उन्हें अपने हाथों से खिलाया और ओढ़ने के लिए कपड़ा भी दिया। कूर्मदास को इतना सुख मिला कि वे भाव-विभोर हो गए।
अगले दिन सुबह जब कूर्मदास जागे तो वह व्यापारी कहीं नहीं था। वे समझ गए कि यह कोई साधारण व्यापारी नहीं था। दरअसल, यह स्वयं भगवान विठ्ठल थे जो अपने भक्त की सेवा करने आए थे।
इस तरह चार महीने तक हर गाँव में यही क्रम चलता रहा। कूर्मदास रेंगते हुए आगे बढ़ते और विठोबा के रूप में भगवान आकर उनके लिए भोजन बनाते, उन्हें खिलाते और फिर अदृश्य हो जाते।
लहुळ गाँव में रुकना पड़ा
चार महीने की कठिन यात्रा के बाद कूर्मदास लहुळ नामक गाँव में पहुँचे। यह गाँव पैठण और पंढरपुर के बीच में पड़ता है। उस दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष की दशमी थी और अगले दिन एकादशी थी।
कूर्मदास ने देखा कि पंढरपुर अभी भी सात कोस (लगभग 22 किलोमीटर) दूर है और वे एक दिन में केवल एक कोस ही रेंग पाते थे। इसका मतलब था कि वे एकादशी तक पंढरपुर नहीं पहुँच सकते।
यह एहसास होते ही कूर्मदास का दिल टूट गया। उन्होंने चार महीने तक इतनी तकलीफ सही थी, सिर्फ इस एक दिन के लिए। और अब वे अपने लक्ष्य से सिर्फ सात कोस दूर थे, फिर भी पहुँच नहीं सकते थे।
भगवान को चिट्ठी लिखना
उसी समय लहुळ गाँव से पंढरपुर की यात्रा निकल रही थी। कई यात्री एकादशी के दर्शन के लिए जा रहे थे। कूर्मदास ने एक यात्री को बुलाया और हाथ जोड़कर कहा, ‘भैया, मैं तो रेंगते-रेंगते विठ्ठल तक नहीं पहुँच सकता। क्या आप मेरी एक चिट्ठी लिखकर भगवान के चरणों में रख देंगे?’
यात्री ने हामी भर दी। कूर्मदास ने अपने दिल की बात कहनी शुरू की और यात्री ने लिखा:
‘मेरे विठ्ठल! प्राणिमात्र के तारणहार! सबके हृदय में होते हुए भी सबसे न्यारे, सबके प्यारे! निराकार होते हुए भी साकार होने में आपको कोई देर नहीं लगती।’
‘हे सर्वसमर्थ! यह दीन बालक प्रार्थना करता है कि मैं लहुळ गाँव में पड़ा हूँ। कल एकादशी को पंढरपुर नहीं पहुँच सकता, पर आप चाहें तो आपको यहाँ प्रकट होने में देर नहीं लगेगी। प्रभु! इस अनाथ बालक को साकार रूप में दर्शन देने की कृपा करें। आपके लिए यह असंभव नहीं है।’
यह चिट्ठी लिखते-लिखते कूर्मदास स्वयं प्रार्थना बन गए। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे और हृदय भक्ति से भरा हुआ था।
भगवान का प्रकट होना
अगले दिन एकादशी को वह यात्री पंढरपुर पहुँचा। उस समय मंदिर के महाद्वार पर संत नामदेव का कीर्तन चल रहा था। भक्तों की भारी भीड़ जुटी थी। यात्री ने भगवान विठ्ठल की मूर्ति के सामने वह चिट्ठी रख दी।
जैसे ही उसने कूर्मदास का संदेश सुनाया, उसी पल एक अद्भुत घटना घटी। पंढरपुर के मंदिर से भगवान विठ्ठल गायब हो गए! मंदिर में हड़कंप मच गया।
उधर लहुळ गाँव में कूर्मदास भगवान की प्रतीक्षा में बैठे थे। अचानक उनके सामने एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ। वह प्रकाश धीरे-धीरे आगे बढ़ा और उसमें से एक सगुण-साकार मूर्ति प्रकट हुई।
कूर्मदास ने तुरंत पहचान लिया कि यह कोई और नहीं, स्वयं भगवान पांडुरंग हैं। वे अपने विठ्ठल हैं। उनके साथ संत ज्ञानेश्वर, संत नामदेव और संत सावताभाई भी थे।
कूर्मदास लोटते हुए भगवान के चरणों तक पहुँचे और अपना सिर उनके चरणों पर रख दिया। उनकी आँखों से खुशी के आँसू बह रहे थे। चार महीने की तपस्या सफल हो गई थी।
भगवान ने माँगा वरदान
भगवान विठ्ठल ने कूर्मदास को अपना चतुर्भुज रूप दिखाया और कहा, ‘कूर्मदास, मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत प्रसन्न हूँ। तुमने जो तपस्या की है, वह अद्वितीय है। माँगो, क्या चाहिए तुम्हें?’
कूर्मदास ने हाथ जोड़कर कहा, ‘प्रभु, मुझे और कुछ नहीं चाहिए। बस इतनी विनती है कि अब आप यहाँ से कहीं मत जाइए। यहीं रहिए, इसी लहुळ गाँव में।’
भगवान ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘तथास्तु। मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करता हूँ। मैं यहीं रहूँगा।’
और उस दिन से भगवान विठ्ठल लहुळ गाँव में ही रह गए। जब तक कूर्मदास जीवित रहे, भगवान उनके साथ ही रहे।
आज भी जीवित है यह कहानी
आज भी महाराष्ट्र के पैठण-पंढरपुर मार्ग पर स्थित लहुळ गाँव में भगवान विठ्ठल का एक प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर की स्थापना उसी समय हुई जब भगवान कूर्मदास से मिलने आए थे।
यह मंदिर संत कूर्मदास की दृढ़ भक्ति और श्रद्धा का जीवंत प्रमाण है। हजारों श्रद्धालु हर साल इस मंदिर में आते हैं और कूर्मदास की इस अद्भुत कहानी को याद करते हैं।
लहुळ गाँव के मंदिर में आज भी वही भाव है, वही ऊर्जा है जो उस दिन कूर्मदास ने महसूस की थी। यहाँ आने वाले भक्त कहते हैं कि इस मंदिर में विशेष शांति मिलती है।

इस कहानी से हमें क्या सीखना चाहिए?
1. शारीरिक सीमाएं भक्ति में बाधा नहीं
कूर्मदास के पास न हाथ थे न पैर, लेकिन उनके पास एक मजबूत इरादा था। उन्होंने यह साबित कर दिया कि भक्ति के लिए शारीरिक क्षमता नहीं, मानसिक दृढ़ता चाहिए।
2. सच्ची लगन के आगे असंभव भी संभव हो जाता है
जब कूर्मदास ने पंढरपुर जाने का फैसला किया तो सभी ने कहा यह असंभव है। लेकिन उनकी लगन इतनी प्रबल थी कि भगवान खुद चलकर आए। यह हमें सिखाता है कि अगर हम पूरे मन से कुछ चाहें तो रास्ते अपने आप बन जाते हैं।
3. भगवान भाव देखते हैं, ऊपरी दिखावा नहीं
कूर्मदास के पास पंढरपुर जाने के लिए न पैसा था, न साधन, न शरीर की शक्ति। लेकिन उनके पास शुद्ध भक्ति का भाव था। भगवान ने उसी भाव को देखा और वे प्रसन्न हो गए। इससे पता चलता है कि भगवान हमारे दिल की सच्चाई को देखते हैं, बाहरी चीजों को नहीं।
4. निराशा में भी आशा की किरण होती है
जब कूर्मदास को लगा कि वे एकादशी तक पंढरपुर नहीं पहुँच पाएंगे, तब भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने भगवान से प्रार्थना की। यह हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी हमें उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए।
आज के समय में यह कहानी क्यों जरूरी है?
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम छोटी-छोटी परेशानियों से घबरा जाते हैं। जरा सी मुश्किल आने पर हम हार मान लेते हैं। ऐसे में कूर्मदास की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि अगर मन में दृढ़ विश्वास हो तो कोई भी बाधा हमें रोक नहीं सकती।
विशेष रूप से विकलांग व्यक्तियों के लिए यह कहानी एक प्रेरणा है। कूर्मदास ने साबित किया कि शारीरिक अक्षमता किसी को भी अपने लक्ष्य से दूर नहीं रख सकती। जरूरत है तो बस एक मजबूत इरादे की।
इसके अलावा, यह कहानी हमें विनम्रता सिखाती है। कूर्मदास ने जब भगवान से वरदान माँगने को कहा गया तो उन्होंने हाथ-पैर नहीं माँगे, धन-दौलत नहीं माँगी। उन्होंने सिर्फ इतना माँगा कि भगवान उनके पास रहें। यह सच्ची भक्ति का उदाहरण है।
पंढरपुर और वारकरी परंपरा
पंढरपुर महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में स्थित एक प्रमुख तीर्थस्थल है। यह भगवान विठ्ठल (पांडुरंग) और देवी रुक्मिणी का प्रसिद्ध मंदिर है। चंद्रभागा नदी के किनारे बसा यह शहर ‘दक्षिण का काशी’ भी कहलाता है।
हर साल आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी पर लाखों वारकरी (तीर्थयात्री) पूरे महाराष्ट्र से पैदल चलकर पंढरपुर आते हैं। यह परंपरा संत ज्ञानेश्वर के समय से चली आ रही है।
कूर्मदास भी इसी वारकरी परंपरा का हिस्सा थे। उन्होंने भी वारी (तीर्थयात्रा) निकाली थी, लेकिन अपने अनोखे तरीके से, रेंगते हुए।
लहुळ का विठ्ठल मंदिर कैसे पहुँचें?
लहुळ गाँव महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में स्थित है। यह पैठण और पंढरपुर के बीच में पड़ता है। यहाँ पहुँचने के लिए:
• औरंगाबाद या पुणे से बस या टैक्सी द्वारा पहुँचा जा सकता है
• निकटतम रेलवे स्टेशन पंढरपुर या औरंगाबाद है
• औरंगाबाद में हवाई अड्डा भी है
मंदिर में जाने का सबसे अच्छा समय कार्तिकी एकादशी के आसपास है, जब विशेष उत्सव मनाया जाता है।

संत कूर्मदास
संत कूर्मदास की कहानी केवल एक धार्मिक कथा नहीं है। यह मानवीय दृढ़ता, आस्था और प्रेम की एक जीवंत मिसाल है। उन्होंने यह साबित किया कि अगर मन में सच्ची लगन हो तो कोई भी बाधा रास्ते में नहीं आ सकती।
आज जब हम जीवन में छोटी-छोटी कठिनाइयों से परेशान हो जाते हैं, तब कूर्मदास की कहानी हमें याद दिलाती है कि हिम्मत और विश्वास से हर मुश्किल आसान हो जाती है।
भगवान विठ्ठल ने कूर्मदास को दर्शन देकर यह संदेश दिया कि वे अपने भक्तों के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। चाहे भक्त कितना भी कमजोर हो, अगर उसकी भक्ति सच्ची है तो भगवान खुद चलकर आते हैं।
लहुळ का विठ्ठल मंदिर आज भी इस बात का गवाह है कि भक्ति में असीम शक्ति होती है। यह मंदिर हर रोज हजारों लोगों को प्रेरणा देता है।
तो अगली बार जब भी आपको लगे कि आपकी परिस्थितियाँ बहुत कठिन हैं, तो कूर्मदास को याद कीजिए। याद कीजिए कि एक ऐसा व्यक्ति जिसके पास हाथ-पैर भी नहीं थे, वह 22 किलोमीटर से ज्यादा रेंगकर चला था, सिर्फ अपने भगवान से मिलने की चाह में।
और याद रखिए, जैसे भगवान विठ्ठल कूर्मदास के लिए पंढरपुर छोड़कर लहुळ आए थे, वैसे ही वे आपके लिए भी हमेशा तैयार हैं। बस जरूरत है सच्ची भक्ति और विश्वास की।




