छत्रपति संभाजी महाराज: धर्मवीर जिन्होंने मृत्यु से पहले धर्म नहीं छोड़ा

छत्रपति संभाजी महाराज का सच्चा इतिहास, जिन्होंने 120 युद्ध लड़े, सभी जीते और धर्म के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। जानिए धर्मवीर की अमर कहानी और उनसे मिलने वाली प्रेरणा।

छत्रपति संभाजी महाराज

इतिहास में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि हर हिंदू के दिल में अमर हो जाते हैं। छत्रपति संभाजी महाराज ऐसे ही एक वीर योद्धा थे, जिनकी कहानी आज की पीढ़ी को जानना बेहद जरूरी है।

छत्रपति शिवाजी महाराज के ज्येष्ठ पुत्र संभाजी महाराज केवल एक राजा नहीं थे। वे एक अद्भुत योद्धा, प्रतिभाशाली लेखक, कुशल रणनीतिकार और सबसे बढ़कर धर्म के रक्षक थे। उन्होंने अपने अल्प जीवनकाल में जो कर दिखाया, वह सदियों तक याद रखा जाएगा।

लेकिन दुर्भाग्य से, उनके बारे में कई झूठे मिथक फैलाए गए हैं। कुछ लोगों ने उन्हें बदनाम करने की कोशिश की है। आज हम सच्चाई जानेंगे और समझेंगे कि क्यों संभाजी महाराज को “धर्मवीर” की उपाधि मिली।

छत्रपति संभाजी महाराज का जीवन परिचय

जन्म और बचपन

14 मई 1657 को पुरंदर किले में जन्मे संभाजी महाराज छत्रपति शिवाजी महाराज और महारानी सईबाई के पहले पुत्र थे। जब वे मात्र ढाई साल के थे, तभी उनकी माता का निधन हो गया। उनकी दादी माता जीजाबाई ने उन्हें पाला और उनमें देशप्रेम, धर्मप्रेम और स्वाभिमान के बीज बोए।

बचपन से ही संभाजी असाधारण प्रतिभा के धनी थे। 13 साल की उम्र तक उन्हें 13 भाषाओं का ज्ञान था, जिसमें हिंदी, संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी शामिल थीं। तलवारबाजी, घुड़सवारी, युद्ध रणनीति और कूटनीति में वे पारंगत हो गए थे।

विद्वान और लेखक

केवल 14 साल की उम्र में संभाजी महाराज ने संस्कृत में तीन ग्रंथ लिखे: बुधभूषण, नखशिख और सातशातक। यह उनकी विद्वता का प्रमाण है। वे न केवल योद्धा थे, बल्कि एक संस्कृत पंडित और साहित्यकार भी थे।

छत्रपति संभाजी महाराज

अजेय योद्धा: 120 युद्धों में अपराजित

पहला युद्ध और सैन्य प्रतिभा

16 साल की उम्र में रामनगर में उन्होंने अपना पहला युद्ध लड़ा और जीता। 1675-76 के दौरान उन्होंने गोवा और कर्नाटक में सफल सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया।

बुरहानपुर विजय

छत्रपति बनने के बाद 1680 में उनका पहला बड़ा युद्ध बुरहानपुर पर था। औरंगजेब की खानदेश सुभा की राजधानी को लूटना कोई साधारण काम नहीं था। 20,000 मराठा सैनिकों ने मुगल सेना को हरा दिया और विशाल खजाना हाथ लगा। यह धन उन्होंने अपनी गरीब प्रजा के कल्याण में लगाया।

अजेय रिकॉर्ड

छत्रपति संभाजी महाराज ने अपने 9 साल के शासनकाल में लगभग 120 से 127 युद्ध लड़े। चौंकाने वाली बात यह है कि वे एक भी युद्ध में पराजित नहीं हुए। इतिहास में सिकंदर जैसे कुछ ही योद्धा हैं जो अजेय रहे, और संभाजी महाराज उन चुनिंदा योद्धाओं में से एक थे।

औरंगजेब जैसे शक्तिशाली बादशाह, जिसकी सेना मराठों से पांच गुना ज्यादा थी और साम्राज्य 15 गुना बड़ा था, उसे भी संभाजी महाराज ने 8 साल तक नाकों चने चबवाए। मुगलों ने न तो एक भी मराठा किला जीत पाया, न ही एक भी जहाज।

धर्म रक्षक: हिंदू पुनर्निर्माण का अभियान

धर्मांतरितों की घर वापसी

संभाजी महाराज ने अपने राज्य में एक अनूठा विभाग स्थापित किया था – “हिंदू पुनर्निर्माण समिति”। यह विभाग उन हिंदुओं की मदद करता था जिन्हें जबरन मुसलमान बनाया गया था लेकिन वे वापस हिंदू धर्म में आना चाहते थे।

एक प्रसिद्ध घटना हरसूल गांव की है, जहां कुलकर्णी नाम के एक ब्राह्मण को मुगलों ने जबरन मुसलमान बना दिया था। जब उन्होंने वापस हिंदू बनने की कोशिश की, तो स्थानीय ब्राह्मणों ने उन्हें अस्वीकार कर दिया। कुलकर्णी संभाजी महाराज के पास गए और महाराज ने तुरंत उनका पुनर्परिवर्तन समारोह करवाया। इस तरह हजारों धर्मांतरित हिंदुओं को उन्होंने वापस अपने धर्म में लाया।

यह वह समय था जब जबरन धर्मांतरण आम था। संभाजी महाराज का यह कदम उनकी धर्म के प्रति निष्ठा और प्रजा की चिंता दोनों को दर्शाता है।

मिथक बनाम सच्चाई

बदनामी का षड्यंत्र

सदियों से संभाजी महाराज के खिलाफ झूठ फैलाए गए हैं। कुछ इतिहासकारों ने उन्हें काले रंग में चित्रित करने की कोशिश की। उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने किसी महिला के साथ दुर्व्यवहार किया, लेकिन यह पूरी तरह से झूठ है।

सच यह है कि बचपन में जब संभाजी महाराज मुगल कैद से बचकर भागे थे, तब वे अज्ञातवास के दौरान एक ब्राह्मण परिवार के यहां रुके थे। वहां उन्होंने लगभग डेढ़ साल ब्राह्मण बालक के रूप में जीवन व्यतीत किया। उनका मथुरा में उपनयन संस्कार भी हुआ और उन्हें संस्कृत की शिक्षा दी गई।

इस घटना को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया। लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज और समकालीन लेखकों की रचनाएं बताती हैं कि संभाजी महाराज एक उच्च चरित्र वाले, धर्मपरायण और न्यायप्रिय राजा थे।

सबसे बड़ा बलिदान: धर्म के लिए मृत्यु

गिरफ्तारी की घटना

1 फरवरी 1689 को संगमेश्वर में राजनीतिक कार्य के लिए गए संभाजी महाराज और उनके मित्र कवि कलश को मुगल सरदार मुकर्रब खान ने धोखे से पकड़ लिया। कुछ विश्वासघाती लोगों ने उनके साथ गद्दारी की थी।

उन्हें बंदी बनाकर जोकरों की वेशभूषा में ऊंट पर बिठाकर मुगल शिविर में घुमाया गया। औरंगजेब ने उनका अपमान करने के लिए हर संभव कोशिश की।

अत्याचार जो इंसानियत को शर्मसार करते हैं

औरंगजेब ने संभाजी महाराज पर अकल्पनीय अत्याचार किए। उनके नाखून उखाड़ दिए गए। एक-एक करके उंगलियां काट दी गईं। उनकी जीभ काट दी गई। आंखें फोड़ दी गईं। पूरे शरीर की खाल उतार दी गई।

हर अत्याचार के बाद औरंगजेब उनसे पूछता था – “इस्लाम कबूल करोगे? मराठा किले हमें सौंप दोगे?”

अमर जवाब

लेकिन धर्मवीर संभाजी महाराज का हर बार एक ही जवाब होता था – नहीं”

इतनी यातनाएं सहने के बाद भी उन्होंने अपना धर्म नहीं छोड़ा। उन्होंने अपना स्वाभिमान नहीं छोड़ा। उन्होंने अपने पिता के स्वराज्य के सपने को नहीं छोड़ा।

11 मार्च 1689 को औरंगजेब ने उनका सिर धड़ से अलग करवा दिया। उनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े करके कुत्तों को खिला दिए गए।

धर्मो रक्षति रक्षितः

संभाजी महाराज ने वास्तव में जिया कि “धर्मो रक्षति रक्षितः” – धर्म उसकी रक्षा करता है जो धर्म की रक्षा करता है।

बलिदान के बाद: मराठों का उत्थान

संभाजी महाराज की शहादत ने मराठों में एक नई ज्वाला जला दी। उनके बलिदान से प्रेरित होकर:
  • उनके छोटे भाई राजाराम ने छत्रपति का पद संभाला
  • ताराबाई ने शानदार सैन्य रणनीति से मुगलों को परेशान किया
  • संताजी घोरपड़े और धनाजी जाधव ने औरंगजेब के शिविर पर हमला कर दिया
  • मराठों ने औरंगजेब को इतना परेशान किया कि वह जीवन भर भगोड़े की तरह भागता रहा
  • अगस्त 1689 में संताजी ने तुलापुर (जहां संभाजी की हत्या हुई थी) पर हमला कर दिया

औरंगजेब अपनी पूरी ताकत झोंकने के बाद भी मराठों को पूरी तरह काबू में नहीं कर सका। संभाजी महाराज के पुत्र शाहू महाराज ने आगे चलकर 40 साल से अधिक समय तक शासन किया और पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में मराठा ध्वज फहराया।

बाजीराव और पेशवाओं ने इस साम्राज्य को दिल्ली तक पहुंचाया। यह सब संभाजी महाराज के बलिदान की नींव पर खड़ा हुआ।

आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणा

धर्म कभी मत छोड़ो

संभाजी महाराज की कहानी हमें सिखाती है कि धर्म सिर्फ पूजा-पाठ नहीं है। यह हमारी पहचान है, हमारी संस्कृति है, हमारे पूर्वजों की विरासत है। चाहे कितनी भी कठिनाइयां आएं, अपने धर्म और मूल्यों को कभी नहीं त्यागना चाहिए।

आज जब युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से दूर हो रही है, तब संभाजी महाराज का जीवन एक मार्गदर्शक प्रकाश है। उन्होंने दिखाया कि स्वाभिमान और धर्म पर जान देना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी वीरता है।

संस्कृति और शिक्षा का महत्व

13 भाषाओं के ज्ञाता, संस्कृत ग्रंथों के लेखक, और एक कुशल योद्धा – संभाजी महाराज समग्र विकास के उदाहरण थे। वे बताते हैं कि शारीरिक बल के साथ-साथ बौद्धिक विकास भी जरूरी है।

स्वाभिमान और साहस

32 साल की छोटी उम्र में इतना कुछ करना, 120 युद्धों में अजेय रहना, और अंत में सबसे कठिन परीक्षा में भी अपने सिद्धांतों पर डटे रहना – यह असाधारण साहस और स्वाभिमान का परिचायक है।

समाज को जागरूक करना हमारा कर्तव्य

सच्चाई को फैलाएं

सदियों से संभाजी महाराज के बारे में झूठ फैलाए गए। आज हमारा कर्तव्य है कि हम सच्चाई को जन-जन तक पहुंचाएं। नई पीढ़ी को बताएं कि छत्रपति संभाजी महाराज कैसे महान थे।

हाल ही में विकिपीडिया पर भी उनके बारे में आपत्तिजनक सामग्री डाली गई थी, जिसके खिलाफ महाराष्ट्र साइबर सेल ने कार्रवाई की। यह दिखाता है कि आज भी षड्यंत्र जारी हैं।

युवाओं को प्रेरित करें

स्कूलों, कॉलेजों और घरों में संभाजी महाराज की कहानी सुनाएं। उनके बलिदान को याद रखें। हर साल 11 मार्च को उनके बलिदान दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करें।

आखरी बात…

छत्रपति संभाजी महाराज केवल इतिहास के पन्नों में नहीं हैं। वे हर उस व्यक्ति के दिल में जीवित हैं जो अपने धर्म, संस्कृति और स्वाभिमान को सर्वोपरि मानता है।

उन्होंने साबित किया कि शारीरिक मृत्यु से बड़ी कोई चीज है – और वह है अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना। “धर्मो रक्षति रक्षितः” सिर्फ एक श्लोक नहीं, बल्कि उनके जीवन का सार था।

आज जब देश और दुनिया में हिंदू धर्म पर तरह-तरह के हमले हो रहे हैं, तब संभाजी महाराज का जीवन हमें याद दिलाता है कि धर्म की रक्षा के लिए हर कुर्बानी छोटी है।

आइए, हम सब मिलकर प्रण लें कि हम अपने धर्म, अपनी संस्कृति और अपनी विरासत को सुरक्षित रखेंगे। चाहे कुछ भी हो जाए, हम अपनी पहचान नहीं खोएंगे।

जय छत्रपति संभाजी महाराज!
धर्मो रक्षति रक्षितः!

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