पैरों से लिखा इतिहास: शीतल देवी ने जीता विश्व तिरंदाजी चैंपियनशिप का स्वर्ण #Shitaldevi

18 वर्षीय शीतल देवी ने बिना हाथों के विश्व पैरा तिरंदाजी चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। जानिए उनकी प्रेरणादायक कहानी।

जब असंभव को संभव बना दिया एक 18 वर्षीय ने

कुछ कहानियां सिर्फ जीत की नहीं होतीं, बल्कि हौसले की होती हैं। शीतल देवी की कहानी ऐसी ही है। 27 सितंबर 2025 को दक्षिण कोरिया के ग्वांगजू में जब उन्होंने तुर्की की विश्व नंबर एक खिलाड़ी ओझनूर क्युर गिर्दी को 146-143 से हराया, तो वो सिर्फ एक मैच नहीं जीतीं, बल्कि लाखों लोगों के लिए एक नई संभावना खोल दी।

शीतल देवी पैरा विश्व तिरंदाजी चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बन गई हैं। और यह जीत किसी साधारण जीत से कहीं ज्यादा है।

वो खिलाड़ी जो अपने पैरों से निशाना साधती है

शीतल देवी का जन्म फोकोमेलिया नामक एक दुर्लभ चिकित्सीय स्थिति के साथ हुआ था, जिसके कारण उनके कंधे से हाथ नहीं हैं। लेकिन इस शारीरिक चुनौती ने उन्हें पीछे नहीं खींचा। उन्होंने अपने पैरों और ठोड़ी का इस्तेमाल करके धनुष चलाना सीखा और आज वो विश्व स्तर पर एकमात्र ऐसी तिरंदाज हैं जो बिना हाथों के प्रतिस्पर्धा करती हैं।

पैरों से धनुष पकड़ना, बाण को सेट करना और फिर ठोड़ी की मदद से प्रत्यंचा खींचकर सटीक निशाना लगाना कोई आसान काम नहीं है। लेकिन शीतल ने इसे अपनी ताकत बना लिया।

पायों से लिखा इतिहास: शीतल देवी

फाइनल मैच: एक रोमांचक मुकाबला

ग्वांगजू में फाइनल मुकाबला किसी फिल्म के क्लाइमैक्स से कम नहीं था। पहला राउंड 29-29 से बराबर रहा। दूसरे राउंड में शीतल ने शानदार प्रदर्शन करते हुए परफेक्ट 30 स्कोर किया, जबकि उनकी प्रतिद्वंद्वी तीन अंक गिर गईं। यहीं से शीतल को बढ़त मिल गई।

तीसरा राउंड भी 29-29 से बराबर रहा। चौथे राउंड में शीतल ने 28 अंक बनाए जबकि गिर्दी ने 29, लेकिन कुल मिलाकर शीतल अभी भी 116-114 से आगे थीं। आखिरी राउंड में शीतल ने तीन परफेक्ट शॉट मारकर 30 अंक बनाए और अपना पहला विश्व चैंपियनशिप स्वर्ण पदक जीत लिया।

यह 2023 के फाइनल का री-मैच था, जहां शीतल को रजत पदक मिला था। इस बार उन्होंने पदक का रंग बदल दिया।

सफर जो 2022 में शुरू हुआ

शीतल की तिरंदाजी यात्रा अपेक्षाकृत नई है, लेकिन उनकी उपलब्धियां असाधारण हैं। 2022 के एशियाई खेलों में उन्होंने अपना पहला बड़ा खिताब जीता। उसके बाद 2023 में विश्व चैंपियनशिप में रजत पदक आया, और 2024 के पेरिस पैरालंपिक्स में राकेश कुमार के साथ मिश्रित टीम में कांस्य पदक।

ग्वांगजू 2025 में उन्होंने तीन पदक जीते: महिला व्यक्तिगत कंपाउंड में स्वर्ण, मिश्रित टीम में कांस्य (तोमन कुमार के साथ), और महिला टीम में रजत। सिर्फ 18 साल की उम्र में इतनी उपलब्धियां वाकई गर्व की बात हैं।

2023 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। और हाल ही में उन्होंने BBC इमर्जिंग एथलीट ऑफ द ईयर का पुरस्कार जीता, ऐसा करने वाली वो पहली भारतीय तिरंदाज हैं।

तकनीक और मानसिक मजबूती

विश्वभर के तिरंदाजी विशेषज्ञों ने शीतल की तकनीक और मानसिक मजबूती की तारीफ की है। पैरों से धनुष संभालने की अनूठी शैली विकसित करना और उसे विश्व स्तर पर इतनी सटीकता से प्रदर्शन करना कोई सामान्य उपलब्धि नहीं है।

एक इंटरव्यू में शीतल ने कहा था, “मैंने बस मेहनत की, मेहनत की और आज मैंने यह हासिल किया।” उनकी सादगी और दृढ़ संकल्प उनकी सबसे बड़ी ताकत है।

भारतीय पैरा खेलों के लिए ऐतिहासिक पल

शीतल देवी की जीत भारतीय पैरा खेलों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। वो पहली भारतीय महिला हैं जिन्होंने पैरा तिरंदाजी विश्व चैंपियनशिप में व्यक्तिगत स्वर्ण पदक जीता है। यह उपलब्धि न सिर्फ उनकी मेहनत का नतीजा है, बल्कि भारतीय पैरा खेल समुदाय के बढ़ते हौसले की भी निशानी है। पेरिस 2024 पैरालंपिक्स के एक साल बाद, शीतल ने अपना पहला विश्व चैंपियनशिप व्यक्तिगत स्वर्ण पदक जीतकर अपने करियर में एक नई ऊंचाई हासिल की है।

NTPC और अन्य संगठनों ने भी शीतल को इस ऐतिहासिक जीत के लिए बधाई दी है। पूर्व क्रिकेटर युवराज सिंह सहित कई खेल हस्तियों ने सोशल मीडिया पर उनकी तारीफ की है।

जम्मू-कश्मीर की बेटी

शीतल जम्मू-कश्मीर से हैं और अपने राज्य और देश का नाम रोशन कर रही हैं। उनकी कहानी खासकर युवा लड़कियों और विशेष क्षमता वाले बच्चों के लिए एक प्रेरणा है कि शारीरिक चुनौतियां आपके सपनों को रोक नहीं सकतीं।

आगे की राह

अगले साल 2026 में एशियन पैरा गेम्स और 2028 में लॉस एंजिल्स पैरालंपिक्स होने वाले हैं। शीतल की फॉर्म और आत्मविश्वास को देखते हुए उनसे और बड़ी उम्मीदें की जा सकती हैं।

लेकिन इस पल में, यह जीत अपने आप में पूर्ण है। यह हमें याद दिलाती है कि इच्छाशक्ति और मेहनत से कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।

शीतल देवी की कहानी सिर्फ एक खेल उपलब्धि नहीं है। यह उन सभी लोगों के लिए एक संदेश है जो किसी न किसी चुनौती का सामना कर रहे हैं। वो हमें बताती हैं कि सीमाएं सिर्फ हमारे मन में होती हैं, और अगर हौसला मजबूत हो तो रास्ते अपने आप बन जाते हैं।

18 साल की उम्र में विश्व चैंपियन बनना कोई छोटी बात नहीं है, खासकर तब जब आपको हर दिन अपनी शारीरिक चुनौतियों के साथ जूझना पड़ता हो। शीतल ने यह साबित कर दिया है कि असली ताकत शरीर में नहीं, बल्कि मन में होती है।

उनकी यह जीत न सिर्फ भारतीय खेलों के लिए गौरव की बात है, बल्कि पूरी मानवता के लिए प्रेरणा है। शीतल देवी ने अपने पैरों से जो इतिहास लिखा है, वो पीढ़ियों तक याद रखा जाएगा।


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