यमुना के किनारे खड़ा सफेद संगमरमर का वह ताज जिसे दुनिया प्रेम का प्रतीक मानती है, भारत में एक और नाम से जाना जाता है तेजोमहालय। और इसी नाम के साथ जुड़ा है एक ऐसा सवाल जो हर कुछ महीनों में सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल जाता है। क्या ताजमहाल शिव मंदिर था? क्या शाहजहाँ ने एक हिंदू राजा का महल छीनकर उसे अपनी पत्नी का मकबरा बना दिया? और क्या Congress ने ICHR और NCERT के जरिए इस सच को दबाए रखा?
ये सवाल बेबुनियाद नहीं हैं। इनके पीछे कुछ वाजिब चिंताएं हैं, कुछ सच्चाइयां हैं और कुछ ऐसी बातें भी हैं जो तथ्यों से मेल नहीं खातीं। इस लेख में हम छह ऐतिहासिक प्रमाणों की रोशनी में इस पूरे विवाद को समझेंगे। न किसी पक्ष को खुश करने के लिए, न किसी को नाराज करने के लिए, बल्कि सिर्फ इसलिए कि हर भारतीय को अपने इतिहास का सच पता होना चाहिए।
पहले जानिए यह विवाद अभी कहाँ है
यह कोई पुराना, सुलझा हुआ मामला नहीं है। मार्च 2026 तक आगरा की दीवानी अदालत में ताजमहाल या तेजोमहालय विवाद की सुनवाई चल रही है। 2024 में योगी यूथ ब्रिगेड के अध्यक्ष कुंवर अजय तोमर ने सावन माह में ताजमहाल में जलाभिषेक और दुग्धाभिषेक की अनुमति मांगी थी। इस मामले में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय और ASI को प्रतिवादी बनाया जा चुका है।
इसके साथ ही जनवरी 2026 में हिंदू महासभा ने ताजमहाल में होने वाले उर्स को रोकने के लिए ASI को ज्ञापन सौंपा। अक्टूबर 2025 में ‘The Taj Story’ नाम की फिल्म रिलीज हुई जिसे लेकर भी जबरदस्त विवाद हुआ। यानी यह मुद्दा आज भी जीवित है और इसीलिए इस पर एक ईमानदार बातचीत जरूरी है।
| 2017 में आगरा जिला अदालत में हुई सुनवाई के दौरान ASI ने हलफनामा दायर किया था जिसमें कहा गया था कि ताजमहाल एक इस्लामिक ढांचा है। यह ASI का आधिकारिक और sworn statement है। |

6 ऐतिहासिक प्रमाण जो इस विवाद का जवाब देते हैं
प्रमाण 1: बादशाहनामा का वह पन्ना जो सबकुछ कह देता है
अगर आप पूछें कि ताजमहाल शिव मंदिर था या मुगल मकबरा, तो पहला जवाब आपको एक ऐसी किताब से मिलेगा जो खुद शाहजहाँ के दरबार में लिखी गई थी। बादशाहनामा, यानी ‘बादशाह का इतिहास’। इसे शाहजहाँ के दरबारी इतिहासकार अब्दुल हमीद लाहौरी ने 1630 के दशक में लिखा था।
इस किताब में दर्ज है कि मुमताज महल का निधन 1631 में बुरहानपुर में हुआ और उनके मकबरे के लिए आगरा में यमुना के किनारे जमीन ली गई। मकबरे का निर्माण 1632 में शुरू हुआ। यह दस्तावेज आज भी ब्रिटिश लाइब्रेरी (लंदन) और नेशनल आर्काइव्स ऑफ इंडिया में सुरक्षित है। कोई भी जाकर देख सकता है।
| बादशाहनामा में लिखा है कि आगरा में यमुना किनारे एक ऐसी जगह जो पहले राजा जय सिंह की थी, जन्नत-मकानी (मुमताज) के मकबरे के लिए चुनी गई। |
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात नोट करें। बादशाहनामा में जय सिंह का जिक्र है। यानी वह जमीन पहले जय सिंह की थी, यह बात खुद उस दस्तावेज में है जिसे शाहजहाँ के पक्ष में लिखा गया था। इसे छुपाया नहीं गया था।
यह प्रमाण कहता है: ताजमहाल का निर्माण शाहजहाँ ने 1632 में शुरू किया। यह किसी Congress सरकार ने नहीं लिखा, यह 400 साल पुराना मुगल दरबारी रिकॉर्ड है।
प्रमाण 2: तीन यूरोपीय यात्री जो खुद वहाँ मौजूद थे
ताजमहाल शिव मंदिर था या मकबरा, इस सवाल में एक बड़ी उलझन यह है कि लोग सोचते हैं सारे सबूत मुगलों के अपने लिखे हुए हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। तीन अलग-अलग यूरोपीय देशों के यात्रियों ने उस दौर में ताजमहाल देखा और अपने संस्मरण लिखे।
पहले हैं Peter Mundy। यह अंग्रेज व्यापारी 1632 में ही आगरा में थे, यानी जब ताजमहाल का निर्माण अभी शुरू ही हुआ था। उन्होंने अपनी डायरी में यमुना किनारे एक मकबरे का निर्माण होते हुए देखने का जिक्र किया और उसका एक रेखाचित्र भी बनाया।
दूसरे हैं Francois Bernier। फ्रांस के यह चिकित्सक 1656 से 1668 तक मुगल दरबार में रहे। उन्होंने ताजमहाल का विस्तृत विवरण लिखा और उसे मुमताज का मकबरा बताया।
तीसरे हैं Jean-Baptiste Tavernier। फ्रांस के ही यह जौहरी 1665 में आगरे आए और उन्होंने अपनी किताब ‘Travels in India’ में ताजमहाल के निर्माण और उसकी भव्यता का विवरण दिया।
| ये तीनों यूरोपीय थे। इनका मुगल दरबार से कोई राजनीतिक लेना-देना नहीं था। इनमें से कोई Congress का एजेंट नहीं था। फिर भी तीनों ने एक ही बात कही। |
यह प्रमाण कहता है: तीन अलग देशों के निष्पक्ष चश्मदीद गवाहों ने ताजमहाल को मकबरा बताया। कहीं शिव मंदिर का जिक्र नहीं।
प्रमाण 3: राजा जय सिंह का पत्र और जमीन का सच
यह बात सौ फीसदी सच है कि जिस जमीन पर ताजमहाल बना, वह पहले आमेर के राजा जय सिंह की थी। इस बात को कोई नहीं नकारता। लेकिन ‘जमीन जय सिंह की थी’ और ‘जमीन जबरदस्ती छीनी गई’ में बहुत फर्क है।
राजा जय सिंह के अभिलेखों में एक दस्तावेज मिला है जिसमें यह स्पष्ट है कि शाहजहाँ ने उनसे यह भूमि माँगी और बदले में आगरा में चार हवेलियाँ दी गईं। यह एक सहमति से हुआ आदान-प्रदान था। अगर जमीन जबरदस्ती ली गई होती, तो राजा जय सिंह के दरबार में इसका कोई शिकायती उल्लेख होता। ऐसा कुछ नहीं है।
इसके अलावा, ताजमहाल परिसर में राजा जय सिंह के सम्मान में एक छत्री बनाई गई थी। दुश्मन की संपत्ति छीनकर उस दुश्मन का स्मारक नहीं बनाते।
यह प्रमाण कहता है: जमीन जय सिंह की थी, लेकिन ‘छीनी’ नहीं गई। यह documented exchange था। इस आधे सच को पूरा झूठ की तरह पेश करना ठीक नहीं।

प्रमाण 4: शिवपुराण और स्कंदपुराण में ‘तेजोमहालय’ क्यों नहीं है?
यह वह प्रमाण है जिस पर सबसे कम बात होती है, लेकिन यह सबसे मजबूत है। अगर तेजोमहालय एक प्राचीन और प्रतिष्ठित शिव मंदिर था तो उसका नाम भारत के प्राचीन ग्रंथों में होना चाहिए था।
शिवपुराण में भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों और प्रमुख मंदिरों का विस्तृत वर्णन है। स्कंदपुराण के तीर्थ-माहात्म्य खंड में शैव तीर्थों की सूची है। लिंगपुराण और मत्स्यपुराण में भी शिव मंदिरों का जिक्र मिलता है। इन किसी भी ग्रंथ में ‘तेजोमहालय’ नाम नहीं मिलता।
P.N. Oak ने 1989 में अपनी किताब ‘Taj Mahal: The True Story’ में यह theory दी। लेकिन उस पूरी किताब में उन्होंने एक भी प्राचीन ग्रंथ का हवाला नहीं दिया जहाँ ‘तेजोमहालय’ का उल्लेख हो। यह इस theory की सबसे बड़ी और अब तक अनुत्तरित कमजोरी है।
| काशी विश्वनाथ, सोमनाथ, महाकालेश्वर जैसे प्राचीन शिव मंदिरों का उल्लेख पुराणों में मिलता है। लेकिन ‘तेजोमहालय’ का नाम किसी वेद, पुराण, आगम या तीर्थ-माहात्म्य ग्रंथ में नहीं है। |
यह प्रमाण कहता है: ‘तेजोमहालय’ नाम का कोई शिव मंदिर किसी भी प्राचीन हिंदू ग्रंथ में दर्ज नहीं है। यह theory की सबसे बड़ी खामी है।
प्रमाण 5: ASI का हलफनामा और कोर्ट का रुख
2017 में आगरा जिला अदालत में जब ताजमहाल को तेजोमहालय बताने वाली याचिका पर सुनवाई हुई, तो Archaeological Survey of India यानी ASI ने कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया। उसमें ASI ने स्पष्ट कहा कि ताजमहाल एक इस्लामिक ढांचा है।
ASI 1861 में अंग्रेजी हुकूमत के दौरान बनी संस्था है। यह Congress से 24 साल पहले अस्तित्व में आई। इसके अधिकारी तकनीकी और पुरातात्विक नियमों के तहत काम करते हैं। इनका sworn statement कोई राजनीतिक बयान नहीं है।
2024 और 2025 में फिर से ताजमहाल के सर्वे की मांग आगरा की अदालत में उठाई गई। लेकिन Supreme Court ने Places of Worship Act 1991 की वजह से निचली अदालतों को ऐसे मामलों में कोई आदेश देने पर रोक लगाई हुई है। यही वजह है कि सर्वे की अर्जी अभी तक सुनवाई के लिए नहीं ली गई।
| यह भी जानना जरूरी है कि BJP 2014 से केंद्र में है। ASI अब BJP सरकार के अधीन है। अगर वहाँ कोई मंदिर छुपा होता, तो पिछले 10 सालों में कोई सुराग तो मिलता। लेकिन ASI ने आज तक ऐसा कुछ नहीं पाया। |
यह प्रमाण कहता है: ASI का sworn statement, कोर्ट का रुख और 10 साल की BJP सरकार में भी कोई नया ‘खुलासा’ नहीं। यह खुद एक बड़ा जवाब है।
प्रमाण 6: Congress और ICHR का पक्षपात जो सच में हुआ
यहाँ एक बात साफ कर दें जो अक्सर दो अलग-अलग दावों को एक में मिला देती है। पहला दावा यह है कि Congress ने NCERT और ICHR के जरिए इतिहास की किताबों में मुगलों को जरूरत से ज्यादा ऊँचा दिखाया। दूसरा दावा यह है कि Congress ने ताजमहाल का सच छुपाया। पहला दावा काफी हद तक सच है। दूसरे का कोई प्रमाण नहीं है।
ICHR और NCERT में क्या हुआ था?
Indian Council of Historical Research यानी ICHR पर दशकों तक वामपंथी झुकाव के इतिहासकारों का दबदबा रहा। Romila Thapar, Irfan Habib और Bipan Chandra जैसे इतिहासकार Congress के शासनकाल में ICHR और NCERT की इतिहास समितियों में प्रमुख रहे। इनकी किताबों में जो हुआ वह दर्ज है।
- पुरानी NCERT की किताबों में मुगल काल को 30 से 40 पन्नों में समझाया गया जबकि मराठा और राजपूत इतिहास को 5 से 8 पन्नों में समेट दिया गया।
- औरंगज़ेब के मंदिर तोड़ने और जजिया कर लगाने जैसी बातों को कुछ किताबों में ‘प्रशासनिक निर्णय’ बताकर नरम किया गया।
- विक्रमादित्य, चंद्रगुप्त और राजा भोज जैसे हिंदू राजाओं के योगदान को उचित स्थान नहीं मिला।
- मराठा और सिख प्रतिरोध को ‘विद्रोह’ जैसे शब्दों में प्रस्तुत किया गया।
यह सब documented है और इसकी आलोचना होनी चाहिए। यह भारतीय इतिहास के साथ अन्याय था।
लेकिन ताजमहाल का सच ‘छुपाया’ कैसे जाता?
ताजमहाल के जो प्राथमिक स्रोत हैं, जैसे बादशाहनामा, Peter Mundy की डायरी, Bernier और Tavernier की किताबें, ये सब ब्रिटेन, फ्रांस और भारत के अलग-अलग पुस्तकालयों और अभिलेखागारों में रखी हैं। इन्हें दुनिया में कोई भी देख सकता है। कोई एक राजनीतिक दल इन्हें ‘छुपा’ नहीं सकता।
जो सच में छुपाया गया वह था हिंदू राजाओं का इतिहास, उनके योगदान को कम करके दिखाना। उसकी आलोचना जरूर होनी चाहिए। लेकिन उस गुस्से को ताजमहाल पर निकालना सही नहीं है।
| NCERT की किताबों में पक्षपात हुआ, यह एक valid और documented शिकायत है। लेकिन ताजमहाल के बारे में प्राथमिक स्रोत पूरी दुनिया में खुले हैं। इन्हें छुपाना किसी के बस की बात नहीं। |
यह प्रमाण कहता है: Congress ने इतिहास-लेखन में पक्षपात किया, यह सच है। लेकिन ताजमहाल के सबूतों को ‘Congress ने छुपाया’ यह साबित नहीं होता।
वह सवाल जिसका जवाब सबको देना होगा
अगर ताजमहाल शिव मंदिर है और Congress ने इसे छुपाया, तो यह सवाल जरूरी है। BJP 2014 से केंद्र में है। 2024 और 2025 में आगरा की अदालत में तेजोमहालय के मामले में केंद्र सरकार खुद प्रतिवादी है। ASI अब केंद्र सरकार के अधीन है। अगर कोई सबूत होता तो 10 सालों में जरूर कुछ सामने आता।
लेकिन आया कुछ नहीं। 2024 में आगरा कोर्ट में ASI ने जवाब देने के लिए बार-बार समय माँगा। 2025 में सुप्रीम कोर्ट की रोक की वजह से सर्वे की अर्जी नहीं सुनी जा सकी। 2026 में मुकदमे अभी भी चल रहे हैं।
यह सब इसलिए नहीं हो रहा कि कोई सच छुपा रहा है। यह इसलिए है क्योंकि सबूत का बोझ उठाना मुश्किल है जब सबूत होता ही नहीं।

एक बात जो दोनों पक्ष मानते हैं और जो गर्व की बात है
इस पूरी बहस में एक बात है जिस पर कोई विवाद नहीं है। ताजमहाल को बनाने वाले कारीगर भारतीय थे। ज्यादातर हिंदू थे। राजस्थान, गुजरात और बुंदेलखंड के पत्थर तराशने वाले, नक्काशी करने वाले, संगमरमर पर पच्चीकारी करने वाले। मुख्य वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी खुद भारत में पले-बढ़े थे।
इसीलिए ताजमहाल में कमल के फूल, जाली का काम और कुछ हिंदू शिल्प के निशान दिखते हैं। यह इस बात का सबूत है कि ताजमहाल भारतीय हाथों की कृति है। यह भारत का गर्व है। इसे हिंदू-मुस्लिम झगड़े की जमीन बनाना उन लाखों कारीगरों के परिश्रम का अपमान है जिन्होंने इसे बनाया।
सच्चाई जो प्रमाण बताते हैं
ताजमहाल शिव मंदिर था या नहीं, इस सवाल का जवाब 6 प्रमाण मिलकर देते हैं। शाहजहाँ के दरबार का अपना रिकॉर्ड, तीन यूरोपीय चश्मदीद गवाह, राजा जय सिंह का दस्तावेज, प्राचीन ग्रंथों में ‘तेजोमहालय’ की अनुपस्थिति, ASI का sworn statement और 10 साल की BJP सरकार में कोई नया खुलासा न होना। यह सब मिलकर एक ही बात कहते हैं।
हाँ, Congress ने NCERT और ICHR के जरिए हिंदू इतिहास के साथ अन्याय किया। यह सच है और इस पर जरूर बात होनी चाहिए। लेकिन उस अन्याय का बदला ताजमहाल को लेकर गलत दावों से नहीं लिया जा सकता।
ताजमहाल भारत का है। यमुना के किनारे, भारतीय कारीगरों के हाथों बना, भारत की धरती पर खड़ा। यह हमारी विरासत है। इसे तथ्यों के साथ जानना, और तथ्यों के साथ रखना, यही इसके प्रति सच्चा सम्मान है।
ताजमहाल भारत का है। इसे समझिए, इस पर गर्व कीजिए और इतिहास को तथ्यों की रोशनी में देखिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या ताजमहाल शिव मंदिर था?
कोई ऐतिहासिक प्रमाण इस बात को साबित नहीं करता। न कोई प्राचीन ग्रंथ ‘तेजोमहालय’ का उल्लेख करता है, न ASI को कोई मंदिर के अवशेष मिले हैं।
क्या Congress ने ताजमहाल का सच छुपाया?
ताजमहाल के प्राथमिक स्रोत दुनियाभर के पुस्तकालयों में खुले पड़े हैं। कोई पार्टी इन्हें नहीं छुपा सकती। हाँ, NCERT की किताबों में हिंदू इतिहास के साथ पक्षपात हुआ, यह जरूर एक valid शिकायत है।
ताजमहाल में हिंदू कारीगरी के निशान क्यों हैं?
क्योंकि इसे बनाने वाले अधिकतर कारीगर हिंदू थे। मुगल वास्तुकला हमेशा Indo-Islamic style की रही जिसमें भारतीय शिल्प का बड़ा योगदान था।
तेजोमहालय के कोर्ट केस का क्या हुआ?
2024-2025 में आगरा की अदालत में ताजमहाल में जलाभिषेक की माँग का मुकदमा चल रहा है। लेकिन Supreme Court ने Places of Worship Act 1991 के चलते निचली अदालतों को ऐसे मामलों में आदेश देने पर रोक लगाई है।
राजा जय सिंह और ताजमहाल का सच?
जमीन पहले जय सिंह की थी, यह सच है। लेकिन बादशाहनामा में लिखा है कि बदले में दूसरी जमीन दी गई। यह सहमति से हुआ आदान-प्रदान था।
स्रोत और संदर्भ
बादशाहनामा, अब्दुल हमीद लाहौरी (1630s), British Library London और National Archives of India
The Travels of Peter Mundy in Europe and Asia, Peter Mundy (1632, Diary)
Travels in the Mogul Empire, Francois Bernier (1670, Amsterdam)
Travels in India, Jean-Baptiste Tavernier (1676, Paris)
ASI Affidavit, Agra District Court (2017)
ETV Bharat Reports on Taj Mahal or Tejomahalaya Case (2024-2025)
The Complete Taj Mahal, Ebba Koch (Thames & Hudson, 2006)
Taj Mahal: The True Story, P.N. Oak (1989)
शिवपुराण, स्कंदपुराण (तीर्थ-माहात्म्य खंड)
NCERT History Textbooks, Old Edition 2002 vs Revised 2023
The Taj Story Film Controversy, Wikipedia (2025)
Hindu Mahasabha Memorandum to ASI, January 2026




