जानिए कैसे IIT के इंजीनियर विशाल जिंदल ने अपने दोस्त के साथ मिलकर बिरयानी बाय किलो की शुरुआत की और 419 करोड़ रुपये का कारोबार खड़ा कर डाला।
40 साल की उम्र में नई शुरुआत
साल 2012 की नवंबर की एक ठंडी शाम। आगरा के सदर बाज़ार में रोशनी से जगमगाती गलियों में खाने का एक ख़ास अनुभव हो रहा था। हेज फंड मैनेजर के रूप में सफल करियर बना चुके विशाल जिंदल वहां अपने पसंदीदा कबाब और तंदूरी चिकन का मज़ा ले रहे थे। लेकिन उस पल जो विचार उनके मन में आया, वो आने वाले सालों में एक बड़े बिज़नेस की नींव बनने वाला था।
जब पूरी दुनिया में मैकडॉनल्ड्स, पिज्जा हट, बर्गर किंग जैसे विदेशी ब्रांड्स का बोलबाला था, विशाल जिंदल के मन में एक सवाल कौंधा – क्या भारत का पारंपरिक खाना भी ग्लोबल ब्रांड बन सकता है? क्या बिरयानी जैसे देसी व्यंजन को लेकर कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी बनाई जा सकती है?
IIT से लेकर हांडी तक का सफर
विशाल जिंदल की कहानी किसी फिल्मी प्लॉट से कम नहीं। आगरा में पैदा हुए इस शख़्स ने कैम्ब्रिज स्कूल से पढ़ाई की और फिर IIT-BHU (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय) से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में B.Tech की डिग्री हासिल की। 1992 से 1994 के बीच उन्होंने अमेरिका के सिरैक्यूज़ यूनिवर्सिटी से MBA किया। फाइनेंस और मार्केटिंग में माहिर बनने के बाद उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से भी पढ़ाई की।
पढ़ाई पूरी करने के बाद 1994 में अमेरिका में मार्केटिंग एसोसिएट के तौर पर काम करना शुरू किया। लेकिन अपने देश की मिट्टी की खुशबू उन्हें वापस खींच लाई। 1996 में भारत लौटकर उन्होंने अपने भाई के साथ मिलकर इलेक्ट्रॉनिक्स ट्रेडिंग कंपनी शुरू की। IBM, Compaq और HP जैसी कंपनियों के लिए अमेरिका, यूरोप, चीन और ताइवान से हाई-वैल्यू इक्विपमेंट सप्लाई करते थे।
करीब एक दशक तक यह बिज़नेस चला, लेकिन मुनाफे में लगातार गिरावट और सिर्फ ट्रेडर बनकर रह जाने की एहसास ने विशाल को परेशान करना शुरू कर दिया। उनके दिल में कुछ अपना, कुछ ऐसा बनाने की ललक थी जो सिर्फ कमाई से बढ़कर हो।
इसके बाद उन्होंने प्राइवेट इक्विटी की दुनिया में कदम रखा। सिंगापुर में काम करते हुए उन्होंने कारपेडिएम कैपिटल पार्टनर्स नामक फंड की स्थापना की। फूड एंड बेवरेज कंपनियों में निवेश करते हुए उन्हें इस सेक्टर की गहरी समझ मिली।
दोस्ती जो बन गई बिज़नेस पार्टनरशिप
2015 में 40 साल की उम्र में विशाल ने अपने प्राइवेट इक्विटी करियर से ब्रेक लेने का फैसला किया। ये वो दौर था जब उनके मन में बिरयानी के बिज़नेस का आइडिया पूरी तरह पक चुका था। लेकिन इस सपने को हकीकत में बदलने के लिए एक साथी की जरूरत थी।
यहीं पर उनके दोस्त कौशिक रॉय आए। कौशिक की कहानी भी कम प्रेरणादायक नहीं है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक वेटर के रूप में की थी और धीरे-धीरे खाद्य उद्योग में गहरी पकड़ बनाई। जब विशाल ने कौशिक के साथ अपने बिज़नेस आइडिया को शेयर किया, तो दोनों ने मिलकर बिरयानी बाय किलो की नींव रखी।
विशाल और कौशिक की सोच साफ थी – पारंपरिक तरीके से बनी, बेहतरीन क्वालिटी की बिरयानी लोगों तक पहुंचाना और इसे एक ग्लोबल ब्रांड बनाना। उन्होंने 50 से 60 लाख रुपये के शुरुआती निवेश के साथ गुड़गांव में अपना पहला आउटलेट खोला।
बिज़नेस आइडिया जो बना गेम चेंजर
बिरयानी बाय किलो की खासियत उसके प्रोडक्ट में थी। जहां दूसरे रेस्टोरेंट बल्क में बिरयानी बनाते हैं, वहीं बिरयानी बाय किलो ने हर ऑर्डर को ताज़ा बनाने का फैसला किया। हर ऑर्डर के लिए मिट्टी की हांडी में बिरयानी तैयार की जाती और उसी हांडी में कस्टमर तक पहुंचाई जाती।
कंपनी की खासियतें:
- हर ऑर्डर के लिए ताज़ा ‘दम’ से पकाई गई बिरयानी
- मिट्टी की हांडी में डिलीवरी
- हर हांडी के साथ मिट्टी की अंगीठी भी दी जाती है
- चार तरह की बिरयानी – हैदराबादी, लखनवी, कोलकाता और गुंटूर
- सबसे महंगे ब्रांडेड चावल का इस्तेमाल
- केरल से खासतौर पर चुने गए मसाले
- गलौटी कबाब, कोरमा और फिरनी जैसे पारंपरिक व्यंजन
मिट्टी के बर्तनों को दिल्ली के बाहरी इलाके में कुम्हारा ग्राम में हाथ से बनवाया जाता है। बीच के बिचौलियों को हटाकर सीधे कारीगरों को रोजगार देने से कंपनी ने सामाजिक जिम्मेदारी भी निभाई।
शुरुआत से शिखर तक
2015 की शुरुआत आसान नहीं थी। पहले महीने में सिर्फ 5 से 6 लाख रुपये की बिरयानी बिकी। लेकिन विशाल और कौशिक का विज़न बहुत बड़ा था। उन्हें पूरा भरोसा था कि क्वालिटी प्रोडक्ट बनाने से ग्राहक खुद-ब-खुद आएंगे।
धीरे-धीरे बिरयानी बाय किलो की पहचान बनने लगी। ज़ोमैटो और स्विगी जैसे प्लेटफॉर्म्स पर कंपनी की रेटिंग्स लगातार बढ़ती रहीं। लोगों को हांडी में आती बिरयानी का कॉन्सेप्ट पसंद आया। जब कोई ऑर्डर घर पहुंचता तो उसके साथ मिट्टी की अंगीठी और मोमबत्ती होती, जिससे बिरयानी को आखिरी समय तक गर्म रखा जा सके।
कंपनी की बढ़ोतरी के आंकड़े:
- FY16: 86 लाख रुपये का रेवेन्यू
- FY20: 48 करोड़ रुपये
- FY23: 218 करोड़ रुपये
- FY24: 268 करोड़ रुपये (23% की वृद्धि)
2024 में कंपनी ने अपने घाटे को भी 30% तक कम कर लिया। FY23 में 101 करोड़ के घाटे को FY24 में घटाकर 71 करोड़ तक लाया गया।

फंडिंग की सफलता
बिज़नेस की ग्रोथ देखकर निवेशकों का भी ध्यान बिरयानी बाय किलो की तरफ गया। कंपनी ने अब तक कई फंडिंग राउंड्स के जरिए 65.3 मिलियन डॉलर (करीब 540 करोड़ रुपये) जुटाए हैं।
प्रमुख निवेश:
- 2018: IvyCap Ventures की अगुवाई में 30 करोड़ रुपये (Series A)
- 2021: Falcon Edge Capital की अगुवाई में 35 मिलियन डॉलर (Series B)
- 2023: Alpha Wave Ventures की अगुवाई में 72 करोड़ रुपये (Series C)
- 2024: Pulsar Capital से 2 मिलियन डॉलर
ये फंडिंग कंपनी ने नए शहरों में विस्तार करने, टेक्नोलॉजी को अपग्रेड करने और सप्लाई चेन को मजबूत बनाने में इस्तेमाल की।
विस्तार और विविधीकरण
आज बिरयानी बाय किलो देश के 45 से ज्यादा शहरों में 100 से अधिक आउटलेट्स के साथ मौजूद है। दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, लखनऊ, जयपुर, देहरादून, कोलकाता और गोवा सहित प्रमुख शहरों में कंपनी ने अपनी पकड़ बना ली है।
सिर्फ बिरयानी तक सीमित न रहते हुए, कंपनी ने अपने मेनू में कबाब, कोरमा, करी और डेज़र्ट जैसे आइटम्स भी जोड़े। 2024 में कंपनी ने गोइला बटर चिकन ब्रांड को भी अपने पोर्टफोलियो में शामिल किया।
कंपनी की खास उपलब्धियां:
- हर महीने लगभग 22 से 25 करोड़ रुपये का कारोबार
- प्रतिदिन औसतन 37 लाख रुपये की बिक्री
- साल में करीब 5 लाख कस्टमर्स को सर्विस
- बिग बॉस के सेट तक पहुंची उनकी बिरयानी
चुनौतियां और उनका सामना
हर बिज़नेस की तरह बिरयानी बाय किलो को भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। शुरुआत में सबसे बड़ी चुनौती थी हर आउटलेट पर खाने की क्वालिटी और स्वाद को एक जैसा बनाए रखना। इसके लिए कंपनी ने मजबूत SOPs (Standard Operating Procedures), सिस्टम्स, प्रोसेस, ट्रेनिंग और ऑडिट्स की व्यवस्था की।
COVID-19 महामारी के दौरान जब पूरा फूड इंडस्ट्री संकट में था, तब भी बिरयानी बाय किलो ने अपनी स्थिति संभाली। लॉकडाउन में जब लोग बाहर जाने से डर रहे थे, कंपनी ने अपने हाइजीन स्टैंडर्ड्स को और मजबूत किया और सेफ्टी मैसेजिंग पर फोकस किया।
प्रतिस्पर्धा भी एक बड़ी चुनौती थी। Rebel Foods का बेहरोज़ बिरयानी, बिरयानी ब्लूज़ और कई छोटे क्लाउड किचन्स के बीच अपनी पहचान बनाए रखना आसान नहीं था। लेकिन कंपनी के यूनिक प्रोडक्ट और सर्विस मॉडल ने इसे अलग बनाया।
बढ़ते कच्चे माल की कीमतें, कुशल कर्मचारियों को बनाए रखना और लॉजिस्टिक्स में होने वाली परेशानियां भी मुश्किलें थीं। लेकिन कंपनी ने टेक्नोलॉजी का सही इस्तेमाल करके इन समस्याओं को काफी हद तक सुलझाया।
टेक्नोलॉजी और इनोवेशन
बिरयानी बाय किलो सिर्फ खाना बेचने वाली कंपनी नहीं है, बल्कि ये एक टेक-एनेबल्ड फूड बिज़नेस है। कंपनी ने अपने ऑपरेशन्स को डिजिटल बनाने में काफी निवेश किया है।
टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल:
- खुद का मोबाइल ऐप और वेबसाइट
- ज़ोमैटो, स्विगी जैसे प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्धता
- इन्वेंटरी मैनेजमेंट सिस्टम
- कस्टमर रिलेशनशिप मैनेजमेंट (CRM)
- रियल-टाइम ऑर्डर ट्रैकिंग
- डेटा एनालिटिक्स से कस्टमर प्रेफरेंस समझना
कंपनी ने ऑम्नीचैनल स्ट्रेटेजी अपनाई है। यानी कस्टमर्स अपनी सुविधा के हिसाब से ऑनलाइन ऑर्डर कर सकते हैं या डाइन-इन रेस्टोरेंट में जा सकते हैं। डेडिकेटेड कस्टमर केयर सेंटर से ग्राहकों की समस्याओं का तुरंत समाधान मिलता है।
बड़ी डील – देवयानी इंटरनेशनल का अधिग्रहण
2025 में बिरयानी बाय किलो की कहानी में एक नया अध्याय जुड़ा। अप्रैल 2025 में देवयानी इंटरनेशनल लिमिटेड ने स्काई गेट हॉस्पिटैलिटी (बिरयानी बाय किलो की पैरेंट कंपनी) में 80.72% हिस्सेदारी 419.6 करोड़ रुपये में खरीदने की घोषणा की।
देवयानी इंटरनेशनल भारत में KFC, Pizza Hut और Costa Coffee जैसे ब्रांड्स की फ्रेंचाइज़ी ऑपरेट करती है। यह डील बिरयानी बाय किलो के लिए एक बड़ा मील का पत्थर है।
इस अधिग्रहण में शामिल:
- बिरयानी बाय किलो
- गोइला बटर चिकन
- द भोजन
रवि जयपुरिया (देवयानी इंटरनेशनल के चेयरमैन) ने कहा कि उनके पोर्टफोलियो में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय ब्रांड्स तो हैं, लेकिन भारतीय व्यंजनों के पारंपरिक स्वाद की कमी महसूस हो रही थी। यह अधिग्रहण उस खालीपन को भरेगा।
विशाल जिंदल की बिज़नेस फिलॉसफी
विशाल जिंदल के पिता एक स्टेबलाइज़र बनाने वाली कंपनी चलाते थे। उनके परिवार में किसी का बिज़नेस बैकग्राउंड नहीं था – विशाल के दादा एक वकील थे। जब उनके पिता ने बिज़नेस शुरू करने का फैसला किया तो लोगों ने संदेह जताया। लेकिन उन्होंने अपने बेटे को हमेशा सिखाया – “ताजमहल बनने से पहले कुछ नहीं था। अगर तुम अपने पैशन से बिज़नेस बना सकते हो, तो वो जादू जैसा है।”
विशाल के अनुसार:
- 40 साल की उम्र रिस्क लेने के लिए परफेक्ट है
- पैशन और बिज़नेस का कॉम्बिनेशन सफलता की गारंटी है
- लोकल व्यंजन भी ग्लोबल ब्रांड बन सकते हैं
- क्वालिटी में कभी कंप्रोमाइज नहीं करना चाहिए
- टेक्नोलॉजी और परंपरा का सही मिश्रण जरूरी है
उन्होंने एक पॉडकास्ट में कहा, “ऑनलाइन फूड डिलीवरी सेक्टर पिछले दशक में फूड एंड बेवरेज इंडस्ट्री से 1.7 से 1.8 गुना तेज़ी से बढ़ रहा है। दुनिया जैसे-जैसे डिजिटल होती जाएगी, ये ट्रेंड जारी रहेगा।”

भविष्य की योजनाएं
हालांकि अब कंपनी देवयानी इंटरनेशनल के पोर्टफोलियो का हिस्सा बन गई है, लेकिन विस्तार की योजनाएं अभी भी बड़ी हैं।
आगे की रणनीति:
- अगले कुछ सालों में 150 से ज्यादा आउटलेट्स
- नए शहरों में प्रवेश
- इंटरनेशनल मार्केट में कदम रखना (खासकर जहां भारतीय डायस्पोरा है)
- प्रोडक्ट लाइन में और विविधता लाना
- कॉर्पोरेट कैटरिंग और B2B सेगमेंट में विस्तार
- टेक्नोलॉजी में और निवेश
कंपनी का लक्ष्य अगले 2-3 सालों में 1000 करोड़ रुपये का टर्नओवर हासिल करना है। देवयानी इंटरनेशनल के साथ पार्टनरशिप से इस लक्ष्य को पाना अब और आसान हो गया है।
सीख और प्रेरणा
विशाल जिंदल और बिरयानी बाय किलो की कहानी से हमें कई सीख मिलती हैं:
1. उम्र सिर्फ एक नंबर है: 40 साल की उम्र में नए वेंचर की शुरुआत करना दिखाता है कि सपने देखने और उन्हें पूरा करने की कोई उम्र नहीं होती।
2. लोकल को ग्लोबल बनाया जा सकता है: भारतीय व्यंजन को प्रीमियम ब्रांड के तौर पर पेश करके विशाल ने साबित किया कि देसी चीजें भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जा सकती हैं।
3. क्वालिटी से कोई समझौता नहीं: हर ऑर्डर को ताज़ा बनाने का फैसला महंगा था, लेकिन यही कंपनी की पहचान बना।
4. टेक्नोलॉजी का सही इस्तेमाल: पारंपरिक खाने को मॉडर्न टेक्नोलॉजी से जोड़कर नए जमाने के कस्टमर्स तक पहुंचना।
5. सामाजिक जिम्मेदारी: कुम्हारों को सीधे रोजगार देकर कंपनी ने दिखाया कि बिज़नेस सिर्फ मुनाफे के लिए नहीं होता।
6. चुनौतियों से हार न मानना: शुरुआती संघर्ष से लेकर COVID-19 तक, हर मुश्किल का सामना डटकर किया।
7. सही पार्टनरशिप: विशाल और कौशिक की जोड़ी ने साबित किया कि अच्छे पार्टनर्स बिज़नेस को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकते हैं।
विशाल जिंदल की कहानी सिर्फ एक सफल बिज़नेसमैन की कहानी नहीं है। ये उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो अपने सपनों को हकीकत में बदलना चाहते हैं। IIT के इंजीनियर से लेकर हेज फंड मैनेजर बनना, और फिर 40 साल की उम्र में सब छोड़कर बिरयानी बेचना – यह सफर आसान नहीं था।
लेकिन विशाल ने अपने पैशन को फॉलो किया, रिस्क लिया, और भारतीय व्यंजन को एक प्रीमियम ब्रांड के तौर पर दुनिया के सामने पेश किया। आज बिरयानी बाय किलो सिर्फ एक कंपनी नहीं, बल्कि ये दिखाता है कि सही विजन, मेहनत और क्वालिटी से कोई भी चीज़ संभव है।
जब भी आप मिट्टी की हांडी में गर्म बिरयानी की खुशबू लें, तो याद कीजिए कि ये सिर्फ खाना नहीं है – ये एक सपने को साकार करने की कहानी है। ये कहानी हर उस व्यक्ति के लिए है जो अपने आइडिया को लेकर संशय में है। अगर विशाल जिंदल 40 साल की उम्र में शुरुआत कर सकते हैं, तो आप क्यों नहीं?
अपने पैशन को पहचानिए, मेहनत कीजिए, क्वालिटी पर फोकस रखिए और सफलता आपके कदम चूमेगी। क्योंकि जैसा विशाल के पिता ने कहा था – “ताजमहल बनने से पहले कुछ नहीं था।” आपका बिज़नेस भी वो ताजमहल बन सकता है जो पहले कभी नहीं था।




