मोहम्मद जावेद से शिबू कृष्ण दासी बनने का पूरा सफर – व्यक्तिगत अनुभव, आध्यात्मिक खोज और धर्म बदलने के पीछे की असली वजहें। जानिए एक मुस्लिम युवक ने कैसे हिंदू धर्म अपनाया। कारण और सच्चाई।
जब रूह ने पुकारा – एक अलग रास्ते की शुरुआत
कभी सोचा है कि जब एक इंसान अपनी पहचान को छोड़कर एक नया रास्ता चुनता है, तो उसके दिल में क्या चलता होगा? मोहम्मद जावेद की कहानी सिर्फ नाम बदलने की नहीं है। यह उस आंतरिक संघर्ष, उन सवालों और उस आध्यात्मिक खोज की कहानी है जो एक युवक को शिबू कृष्ण दासी बना गई।
धर्म सिर्फ एक पहचान नहीं होता। यह विश्वास है, संस्कार है और जीवन जीने का तरीका है। लेकिन जब यही विश्वास डगमगाने लगे, जब सवाल दिल में उठने लगें, तो क्या होता है? जावेद की यात्रा ऐसे ही सवालों से शुरू हुई।
कौन थे मोहम्मद जावेद? शुरुआती जीवन और पृष्ठभूमि
मोहम्मद जावेद का जन्म एक साधारण मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनकी परवरिश इस्लामिक परंपराओं के बीच हुई। नमाज पढ़ना, रमजान में रोजा रखना, कुरान की आयतें सुनना – यह सब उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था।
बचपन से ही जावेद को धार्मिक मामलों में गहरी दिलचस्पी थी। वह सिर्फ रस्में नहीं निभाते थे, बल्कि हर बात को समझना चाहते थे। उनके मन में हमेशा सवाल उठते रहते थे।
पढ़ाई-लिखाई में अच्छे जावेद को किताबें पढ़ने का बहुत शौक था। धर्म, दर्शन और आध्यात्मिकता पर लिखी किताबें उन्हें खास तौर पर आकर्षित करती थीं। और यहीं से शुरू हुई उनकी आंतरिक यात्रा।
पहला आध्यात्मिक अनुभव – जब मन में उठा पहला सवाल
जावेद को याद है वह दिन जब उनके मन में पहली बार गहरा सवाल उठा। वह उस समय किशोर थे। एक दिन मस्जिद से लौटते समय उन्होंने एक हिंदू मंदिर में भजन सुना। कुछ ऐसा था उस संगीत में कि वह वहीं रुक गए।
“मुझे नहीं पता क्यों, लेकिन उस भजन ने मेरे दिल को छू लिया था,” जावेद ने बाद में एक साक्षात्कार में कहा था। “मैंने सोचा कि भगवान तो एक ही है, फिर पूजा का तरीका अलग क्यों?”
यह सवाल छोटा लग सकता है, लेकिन जावेद के लिए यह एक बड़ी शुरुआत थी। उन्होंने तय किया कि वह सिर्फ अपने धर्म तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि दूसरे धर्मों को भी समझने की कोशिश करेंगे।
दूसरे धर्मों की खोज – एक नई दुनिया का दरवाजा
जावेद ने चुपचाप दूसरे धर्मों के बारे में पढ़ना शुरू किया। पहले उन्होंने ईसाई धर्म के बारे में पढ़ा, फिर बौद्ध धर्म। लेकिन हिंदू धर्म ने उन्हें सबसे ज्यादा आकर्षित किया।
हिंदू धर्म की विविधता, उसके दर्शन की गहराई और भक्ति की अवधारणा ने उन्हें मोह लिया। उन्होंने भगवद गीता पढ़ी। पहले तो सिर्फ जिज्ञासा से, लेकिन धीरे-धीरे वह गीता के श्लोक उनके दिल में उतरने लगे।
“जब मैंने गीता में कृष्ण का अर्जुन से कहना पढ़ा कि ‘तू अपना कर्म कर, फल की चिंता मत कर,’ तो मुझे लगा कि यह तो जीवन का सबसे बड़ा सच है,” जावेद ने बताया।
वह छुपकर मंदिरों में जाने लगे। पहले दूर से देखते थे, फिर धीरे-धीरे अंदर जाने लगे। आरती की घंटियां, धूप-दीप की खुशबू और भक्तों की श्रद्धा – यह सब उन्हें एक अलग ही दुनिया में ले जाता था।
आंतरिक संघर्ष – दो दुनियाओं के बीच फंसा मन
लेकिन यह यात्रा आसान नहीं थी। जावेद के मन में लगातार संघर्ष चलता रहता था। एक तरफ उनकी परवरिश, उनका परिवार और उनकी पहचान थी। दूसरी तरफ एक नया रास्ता था जो उन्हें बुला रहा था।
रातों को नींद नहीं आती थी। “क्या मैं गलत कर रहा हूं?” यह सवाल उन्हें बार-बार परेशान करता था। परिवार को कैसे बताएंगे? समाज क्या कहेगा? और सबसे बड़ा सवाल – क्या यह सच में अल्लाह की मर्जी है?
जावेद ने बताया कि इस दौरान वह बहुत परेशान रहते थे। “मैं दोनों तरफ से खिंचा जा रहा था। एक तरफ मेरा खानदान था, दूसरी तरफ मेरी रूह की पुकार।”
इस संघर्ष के दौरान उन्होंने बहुत दुआएं मांगीं, बहुत प्रार्थनाएं कीं। वह चाहते थे कि उन्हें कोई संकेत मिले, कोई रास्ता दिखे।
वह रात – जब सब कुछ साफ हो गया
फिर एक रात आई जिसने जावेद की जिंदगी बदल दी। उस रात उन्हें एक सपना आया। सपने में उन्होंने खुद को एक मंदिर में देखा। वहां भगवान कृष्ण की मूर्ति थी और एक अजीब सी शांति थी।
“उस सपने में मुझे एहसास हुआ कि मैं घर लौट आया हूं,” जावेद ने कहा। “जैसे मैं बरसों से भटक रहा था और आखिरकार मुझे मेरी मंजिल मिल गई।”
सुबह जब वह उठे तो उनका मन एकदम साफ था। उन्हें पता था कि अब उन्हें क्या करना है। यह आसान नहीं होगा, लेकिन यह जरूरी था।
उन्होंने तय किया कि वह अपने दिल की सुनेंगे। अगर उनकी आत्मा उन्हें कृष्ण की भक्ति की तरफ खींच रही है, तो उसी रास्ते पर चलेंगे।
कृष्ण से पहली मुलाकात – भक्ति का अनुभव
जावेद ने जब पहली बार मन से कृष्ण की पूजा की, तो उन्हें एक अलग ही अनुभव हुआ।
“मैंने मंदिर में कृष्ण की मूर्ति के सामने बैठकर आंखें बंद कीं। पहली बार मैंने किसी भगवान को साकार रूप में महसूस किया,” उन्होंने याद करते हुए बताया। “मुझे लगा जैसे कोई मुझे गले लगा रहा है, मेरे सारे दुख दूर कर रहा है।”
यह भक्ति का पहला अनुभव था। जावेद को समझ आया कि हिंदू धर्म में भगवान को सिर्फ एक शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रियतम, एक दोस्त, एक मार्गदर्शक के रूप में देखा जाता है।
कृष्ण की लीलाएं सुनते समय उनकी आंखों में आंसू आ जाते। राधा-कृष्ण की प्रेम कहानी, कृष्ण का गोपियों के साथ रास, यशोदा मैया का वात्सल्य – यह सब उन्हें भाव-विभोर कर देता था।
राधा-कृष्ण की प्रेम लीला से मिली प्रेरणा
जावेद के लिए राधा-कृष्ण की कहानी एक खास महत्व रखती थी। उन्हें लगा कि यह सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है।
“राधा का कृष्ण के प्रति प्रेम, वह विरह, वह समर्पण – यह सब मुझे बहुत गहराई से छूता था,” जावेद ने कहा। “मुझे लगा कि मैं भी राधा की तरह कृष्ण को खोज रहा हूं। मेरी आत्मा भी उस परम प्रेम को चाहती है।”
इस्कॉन (ISKCON) के एक केंद्र में जाकर उन्होंने ‘हरे कृष्ण’ महामंत्र का जाप करना शुरू किया। पहली बार जब उन्होंने “हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे” गाया, तो उनका पूरा शरीर रोमांचित हो गया।
गुरु से मिलन – एक नए जीवन की शुरुआत
आध्यात्मिक यात्रा में गुरु की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। जावेद को भी अपने गुरु मिले, जिन्होंने उन्हें सही रास्ता दिखाया।
उनके गुरु एक वैष्णव संत थे जो कृष्ण भक्ति के प्रचारक थे। जब जावेद पहली बार उनसे मिले, तो उन्हें लगा जैसे वह अपने पिता से मिल रहे हैं।
“गुरुजी ने मुझे कभी नहीं कहा कि तुम धर्म बदल लो,” जावेद ने बताया। “उन्होंने सिर्फ इतना कहा – ‘बेटा, तुम्हारा दिल जो कहे, वही सच है। भगवान तुम्हारे भीतर है, बाहर नहीं।'”
गुरुजी ने उन्हें गीता की गहराई से शिक्षा दी। कर्म योग, भक्ति योग, ज्ञान योग – सब कुछ समझाया। उन्होंने बताया कि हिंदू धर्म में भगवान तक पहुंचने के कई रास्ते हैं और हर व्यक्ति अपना रास्ता चुन सकता है।
फैसले का दिन – जब जावेद ने तय किया अपना रास्ता
महीनों की आंतरिक यात्रा के बाद जावेद ने अपना अंतिम फैसला लिया। उन्होंने तय किया कि वह आधिकारिक रूप से हिंदू धर्म अपनाएंगे।
यह फैसला लेना जितना मुश्किल था, उतना ही मुश्किल था इसे परिवार को बताना। एक दिन उन्होंने हिम्मत जुटाई और अपने पिता से बात की।
“अब्बा, मुझे आपसे कुछ कहना है,” जावेद ने कहा। उनकी आवाज कांप रही थी। “मैं हिंदू धर्म अपनाना चाहता हूं।”
पिता पहले तो स्तब्ध रह गए। फिर गुस्सा आया, फिर दुख। “यह तुम क्या कह रहे हो, जावेद? तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या?”
लेकिन जावेद दृढ़ थे। उन्होंने अपने पिता को अपना पूरा अनुभव बताया, अपनी आध्यात्मिक यात्रा के बारे में बताया। “अब्बा, यह मेरी रूह की पुकार है। मैं अपने आप के खिलाफ नहीं जा सकता।”

धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया – शुद्धिकरण और नया जन्म
गुरुजी के मार्गदर्शन में जावेद ने विधिवत हिंदू धर्म अपनाने की प्रक्रिया शुरू की। यह सिर्फ एक कानूनी प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि एक आध्यात्मिक पुनर्जन्म था।
पहले शुद्धिकरण की रस्म हुई। गंगाजल से स्नान कराया गया। वैदिक मंत्रों का उच्चारण हुआ। जावेद ने महसूस किया जैसे उनके सारे पाप धुल गए हों, सारा बोझ हल्का हो गया हो।
फिर उनका नामकरण संस्कार हुआ। गुरुजी ने उन्हें नया नाम दिया – शिबू कृष्ण दासी। “शिबू” नाम उनके व्यक्तित्व के आधार पर चुना गया और “कृष्ण दासी” का मतलब है कृष्ण का सेवक।
“जब गुरुजी ने मुझे यह नाम दिया, तो मुझे लगा कि आज मेरा असली जन्म हुआ है,” शिबू ने कहा। “मैं अब मोहम्मद जावेद नहीं रहा, मैं शिबू कृष्ण दासी बन गया।”
उन्होंने तुलसी की माला पहनी, माथे पर तिलक लगाया और पहली बार हिंदू के रूप में कृष्ण की पूजा की। उस दिन उनकी आंखों में खुशी के आंसू थे।
परिवार की प्रतिक्रिया – सबसे मुश्किल दौर
धर्म परिवर्तन के बाद का समय शिबू के लिए सबसे कठिन था। परिवार ने उन्हें लगभग त्याग दिया।
माता-पिता ने कई दिनों तक उनसे बात नहीं की। भाई-बहनों ने दूरी बना ली। रिश्तेदारों ने तो उन्हें घर में घुसने तक नहीं दिया।
“मां रोती रहती थीं। वह कहती थीं, ‘मैंने तुझे जन्म दिया, पाला-पोसा, और तूने यह दिन दिखाया?'” शिबू ने दुखी होकर कहा। “यह मेरे लिए सबसे दर्दनाक था।”
पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया। “अब से तुम मेरे बेटे नहीं रहे,” पिता ने कहा। “जो रास्ता तुमने चुना है, उस पर अकेले चलो।”
कुछ दिनों तक शिबू बेघर रहे। गुरुजी के आश्रम में रहने लगे। यह समय बहुत मुश्किल था, लेकिन उनका विश्वास डगमगाया नहीं।
समाज का विरोध – जब अपने ही पराए हो गए
परिवार के अलावा समाज में भी शिबू को विरोध का सामना करना पड़ा।
मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने उन्हें ‘गद्दार’ और ‘धर्मद्रोही’ कहा। उन्हें धमकियां भी मिलीं। कुछ लोगों ने कहा कि उन्हें जबरदस्ती धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया है।
“लोग तरह-तरह की बातें बनाते थे,” शिबू ने बताया। “कोई कहता कि मुझे पैसे मिले हैं, कोई कहता कि किसी लड़की के चक्कर में धर्म बदला। लेकिन सच्चाई सिर्फ मुझे पता थी।”
सोशल मीडिया पर भी उनके खिलाफ काफी कुछ लिखा गया। कुछ लोगों ने इसे राजनीतिक रंग दे दिया। उनकी तस्वीरें वायरल हुईं और लोगों ने तरह-तरह की टिप्पणियां कीं।
लेकिन हिंदू समुदाय में भी सब कुछ आसान नहीं था। कुछ लोग उन्हें संदेह की नजर से देखते थे। “असली हिंदू तो जन्म से होता है,” कुछ लोगों ने कहा।
नई जिंदगी की शुरुआत – कृष्ण भक्त के रूप में जीवन
धीरे-धीरे शिबू ने अपनी नई जिंदगी को स्वीकार किया। वह पूरी तरह से कृष्ण भक्ति में डूब गए।
सुबह 4 बजे उठना, मंगला आरती में शामिल होना, फिर पूरे दिन मंदिर की सेवा करना – यह उनकी दिनचर्या बन गई। वह भजन-कीर्तन में हिस्सा लेते, कृष्ण की कहानियां सुनाते और भगवद गीता का प्रचार करते।
“पहली बार मुझे लगा कि मेरी जिंदगी में एक उद्देश्य है,” शिबू ने कहा। “मैं सिर्फ जी नहीं रहा, बल्कि जीवन को जी रहा हूं।”
उन्होंने शाकाहारी भोजन अपनाया। तुलसी की माला हमेशा गले में रहती। माथे पर चंदन का तिलक और हाथों में कृष्ण की पुस्तकें – यह उनकी नई पहचान बन गई।
प्रथम जन्माष्टमी – कृष्ण भक्त के रूप में पहला उत्सव
शिबू को सबसे यादगार अनुभव अपनी पहली जन्माष्टमी का रहा।
“मैंने पहले भी जन्माष्टमी देखी थी, लेकिन बाहर से। इस बार मैं उत्सव का हिस्सा था,” उन्होंने खुशी से बताया।
उन्होंने मंदिर की सजावट में मदद की। कृष्ण की मूर्ति को नए कपड़े पहनाए। पूरी रात जागकर भजन गाए। आधी रात को जब कृष्ण का जन्म हुआ, तो उन्होंने आरती की।
“उस पल मुझे लगा कि कृष्ण सच में मेरे सामने हैं,” शिबू ने आंखों में आंसू लिए कहा। “मैंने अपने हाथ जोड़े और कहा, ‘हे कृष्ण, मैं आपका दासी हूं। मेरा जीवन अब आपको समर्पित है।'”
उस दिन उन्हें एहसास हुआ कि उन्होंने जो फैसला लिया था, वह एकदम सही था।
वृंदावन यात्रा – कृष्ण की नगरी में पहली बार
शिबू के लिए सबसे बड़ा आध्यात्मिक अनुभव वृंदावन यात्रा का रहा।
गुरुजी के साथ जब वह पहली बार वृंदावन पहुंचे, तो उनका दिल धक-धक कर रहा था। “यह वही जगह है जहां मेरे कृष्ण ने बाल लीलाएं कीं,” उन्होंने सोचा।
बांके बिहारी मंदिर में जब उन्होंने पहली बार कृष्ण की मूर्ति देखी, तो वह जमीन पर गिर पड़े। रोते-रोते प्रणाम किया। “मुझे लगा जैसे कृष्ण मुझे देख रहे हैं, मुस्कुरा रहे हैं।”
निधिवन में जाकर उन्होंने वह जगह देखी जहां कहा जाता है कि रात में राधा-कृष्ण रास रचाते हैं। यमुना के तट पर बैठकर उन्होंने घंटों ध्यान किया।
“वृंदावन में मुझे पहली बार पूर्ण शांति मिली,” शिबू ने कहा। “वहां की हवा में भी कृष्ण का नाम है। हर पत्थर, हर पेड़ कृष्ण की कहानी सुनाता है।”
उन्होंने राधा रानी मंदिर में राधा जी के दर्शन किए। “राधा जी, आप कृष्ण से मिलाने की कृपा करना,” उन्होंने प्रार्थना की। उस दिन उनका विश्वास और भी गहरा हो गया।
आध्यात्मिक परिवर्तन – भीतर से बदलाव
धर्म परिवर्तन के बाद शिबू ने अपने भीतर बहुत बदलाव महसूस किए।
“पहले मैं हमेशा परेशान रहता था,” उन्होंने बताया। “मन में बेचैनी रहती थी, गुस्सा आता था। लेकिन अब मुझे शांति मिली है।”
कृष्ण भक्ति ने उनके व्यक्तित्व को बदल दिया। वह ज्यादा धैर्यवान, ज्यादा प्रेमी और ज्यादा संवेदनशील हो गए। दूसरों की मदद करना उनका स्वभाव बन गया।
“कृष्ण ने मुझे सिखाया कि सबसे प्यार करो, सबको अपना मानो,” शिबू ने कहा। “अब मैं किसी से नफरत नहीं करता। जिन लोगों ने मुझे छोड़ा, उनके लिए भी मेरे दिल में प्यार है।”
उन्होंने ध्यान और योग को अपनी दिनचर्या में शामिल किया। हर सुबह एक घंटे ध्यान करते और कृष्ण के नाम का जाप करते। इससे उन्हें मानसिक शांति मिलती।
माता-पिता से पुनर्मिलन – प्यार की जीत
कई महिनों बाद एक दिन शिबू को अपनी मां से फोन आया।
“जावेद… मेरा मतलब शिबू,” मां ने रोते हुए कहा। “मैं तुमसे मिलना चाहती हूं।”
शिबू के लिए यह सबसे भावुक पल था। महीनों से वह इसी दिन का इंतजार कर रहे थे। अगले दिन वह अपने घर गए।
मां ने दरवाजा खोला और अपने बेटे को देखकर फूट-फूटकर रो पड़ीं। “तुम कैसे हो बेटा? खाना ठीक से खाते हो ना?”
“अम्मी, मैं बिल्कुल ठीक हूं,” शिबू ने कहा। उन्होंने अपनी मां को गले लगाया। “आप परेशान मत होइए।”
धीरे-धीरे माता-पिता ने शिबू के फैसले को स्वीकार करना शुरू किया। हालांकि वे खुश नहीं थे, लेकिन उन्होंने अपने बेटे से रिश्ता तोड़ना भी नहीं चाहा।
“हम तुम्हारे फैसले से सहमत नहीं हैं,” पिता ने कहा। “लेकिन तुम हमारे बेटे हो और रहोगे। बस यह मत भूलना कि तुम्हें किसने जन्म दिया।”
शिबू के लिए यह एक बड़ी राहत थी। “अब्बा, मैं आपको कभी नहीं भूल सकता,” उन्होंने कहा। “भले ही मेरा धर्म बदल गया है, लेकिन आपके प्रति मेरा प्यार और सम्मान वैसा ही है।”
आज भी शिबू अपने माता-पिता से मिलने जाते हैं। ईद पर भी जाते हैं, हालांकि अब वह रोजा नहीं रखते। लेकिन परिवार के साथ बैठकर खाना खाते हैं और अपने भाई-बहनों से मिलते हैं।

भगवद गीता का गहरा अध्ययन – ज्ञान की प्राप्ति
शिबू ने अपना ज्यादातर समय भगवद गीता के अध्ययन में लगाना शुरू किया।
“गीता सिर्फ एक धार्मिक किताब नहीं है,” उन्होंने कहा। “यह जीवन जीने की कला सिखाती है। हर श्लोक में गहरा दर्शन छिपा है।”
उन्हें गीता का दूसरा अध्याय सबसे प्रिय है, जहां कृष्ण अर्जुन को आत्मा की अमरता के बारे में बताते हैं।
“जब मैंने पढ़ा कि ‘आत्मा ना जन्म लेती है, ना मरती है,’ तो मुझे बहुत शांति मिली,” शिबू ने बताया। “मुझे समझ आया कि यह शरीर तो बस एक कपड़ा है। असली मैं तो आत्मा हूं।”
गीता के कर्म योग ने उनकी जिंदगी बदल दी। उन्होंने सीखा कि काम करना जरूरी है, लेकिन नतीजे की चिंता नहीं करनी चाहिए। बस अपना सर्वश्रेष्ठ देना चाहिए।
“पहले मैं हर छोटी-छोटी बात पर परेशान हो जाता था,” उन्होंने कहा। “लेकिन अब मैं बस अपना काम करता हूं और बाकी सब कृष्ण पर छोड़ देता हूं।”
संकीर्तन और भजन – संगीत में डूबा मन
शिबू को संगीत से बहुत प्यार था और कृष्ण भक्ति में संगीत की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है।
उन्होंने हारमोनियम बजाना सीखा और भजन गाने लगे। “हरे कृष्ण” महामंत्र उनका सबसे प्रिय जाप बन गया।
“जब मैं ‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे’ गाता हूं, तो मुझे लगता है कि मैं कृष्ण से बात कर रहा हूं,” शिबू ने कहा।
हर शनिवार को मंदिर में संकीर्तन होता है। शिबू इसमें जरूर शामिल होते हैं। ढोलक और मृदंग की थाप पर सभी भक्त नाचते-गाते हैं।
“संकीर्तन में एक अलग ही ऊर्जा होती है,” उन्होंने बताया। “जब सब लोग मिलकर कृष्ण का नाम लेते हैं, तो लगता है जैसे भगवान वहीं मौजूद हैं।”
मीरा बाई के भजन शिबू को खास पसंद हैं। “मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो ना कोई” – यह भजन गाते समय उनकी आंखों में आंसू आ जाते हैं।
तुलसी सेवा और मंदिर की सफाई – निष्काम सेवा का अनुभव
शिबू ने निष्काम सेवा को अपने जीवन का अहम हिस्सा बनाया।
हर सुबह वह सबसे पहले तुलसी के पौधे की सेवा करते हैं। तुलसी को पानी देते हैं, दीप जलाते हैं और प्रदक्षिणा करते हैं।
“तुलसी माता बहुत पवित्र हैं,” शिबू ने कहा। “कृष्ण को तुलसी बहुत प्रिय है। तुलसी की सेवा करना मतलब कृष्ण की सेवा करना।”
मंदिर की सफाई में भी वह बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। फर्श पोछना, बर्तन धोना, फूल चढ़ाना – कोई भी काम छोटा नहीं लगता।
“जब मैं मंदिर की सफाई करता हूं, तो मुझे लगता है कि मैं कृष्ण के घर को साफ कर रहा हूं,” उन्होंने कहा। “यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है।”
इस निष्काम सेवा ने उन्हें विनम्रता सिखाई। “पहले मुझे अपने अहंकार का पता ही नहीं था,” शिबू ने स्वीकार किया। “लेकिन जब मैं झाड़ू लगाता हूं या बर्तन धोता हूं, तो मुझे याद आता है कि मैं कुछ नहीं हूं। सब कुछ कृष्ण की कृपा है।”
प्रसाद बनाना – भक्ति का स्वाद
शिबू ने मंदिर में प्रसाद बनाना भी सीखा।
“कृष्ण को भोग लगाने के लिए खाना बनाना एक खास कला है,” उन्होंने बताया। “हर चीज शुद्ध होनी चाहिए, प्यार से बनाई जानी चाहिए।”
उन्होंने शाकाहारी व्यंजन बनाना सीखा। खीर, हलवा, पूरी-सब्जी, लड्डू – सब कुछ। लेकिन सबसे खास बात यह थी कि वह हर चीज प्रेम और भक्ति से बनाते।
“जब मैं खाना बनाता हूं तो कृष्ण को याद करता हूं,” शिबू ने कहा। “मैं सोचता हूं कि कृष्ण क्या पसंद करेंगे। यह सिर्फ खाना नहीं है, यह प्रेम का भोग है।”
पहली बार जब उन्होंने खुद बनाया हुआ प्रसाद कृष्ण को भोग लगाया, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
“मैंने देखा कि भोग लगाने के बाद प्रसाद का स्वाद बदल जाता है,” उन्होंने आश्चर्य से कहा। “यह और भी स्वादिष्ट हो जाता है। यह कृष्ण की कृपा है।”
एकादशी व्रत – आत्म-संयम का पाठ
शिबू ने एकादशी व्रत को बड़ी गंभीरता से अपनाया।
एकादशी के दिन वह पूरा दिन उपवास रखते या सिर्फ फलाहार करते। पूरा दिन कृष्ण नाम का जाप करते और भजन गाते।
“पहली एकादशी बहुत मुश्किल थी,” शिबू ने याद किया। “मुझे बहुत भूख लगी। लेकिन मैंने सोचा कि अगर कृष्ण के लिए यह छोटी सी तकलीफ नहीं सह सकता, तो मैं किस काम का भक्त।”
धीरे-धीरे व्रत रखना आसान होता गया। “अब तो एकादशी का मुझे इंतजार रहता है,” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। “इस दिन मैं कृष्ण के ज्यादा करीब महसूस करता हूं।”
व्रत ने उन्हें आत्म-संयम सिखाया। “जब आप खाने जैसी मूलभूत जरूरत को नियंत्रित कर सकते हैं, तो आप अपने मन को भी नियंत्रित कर सकते हैं,” शिबू ने कहा।
कृष्ण से बातचीत – ध्यान में मिले अनुभव
शिबू का कहना है कि ध्यान के दौरान वह कृष्ण से बातचीत करते हैं।
“यह पागलपन लग सकता है, लेकिन मैं सच में कृष्ण से बात करता हूं,” उन्होंने कहा। “मैं उन्हें अपनी समस्याएं बताता हूं, अपनी खुशियां बांटता हूं।”
कई बार ध्यान में उन्हें कृष्ण के दर्शन होते हैं। “मैं उन्हें मोर पंख पहने, मुरली बजाते हुए देखता हूं,” शिबू ने बताया। “वह मुस्कुराते हैं और मुझे आशीर्वाद देते हैं।”
एक बार ध्यान में उन्हें बहुत गहरा अनुभव हुआ। “मुझे लगा जैसे मैं वृंदावन में हूं,” उन्होंने आंखें बंद करके याद किया। “चारों तरफ गोपियां नाच रही हैं और बीच में कृष्ण खड़े हैं। उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और कहा, ‘तुम मेरे हो, मैं तुम्हारा हूं।'”
यह अनुभव शिबू के लिए बहुत भावुक था। “उस दिन के बाद मेरे मन से सारे संशय मिट गए,” उन्होंने कहा। “मुझे पक्का यकीन हो गया कि मैं सही रास्ते पर हूं।”
सेवा कार्य – दूसरों की मदद में मिली संतुष्टि
कृष्ण भक्ति ने शिबू को सेवा का महत्व सिखाया।
वह अब गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करते हैं। हर रविवार को वह मंदिर में भंडारा आयोजित करने में मदद करते हैं जहां सभी को मुफ्त में प्रसाद मिलता है।
“कृष्ण ने गीता में कहा है कि जो दूसरों की सेवा करता है, वह मेरी सेवा करता है,” शिबू ने कहा। “इसलिए मैं हर इंसान में कृष्ण को देखने की कोशिश करता हूं।”
उन्होंने एक छोटे स्कूल में गरीब बच्चों को मुफ्त में पढ़ाना भी शुरू किया। “ये बच्चे कृष्ण के हैं,” उन्होंने कहा। “इन्हें पढ़ाना मेरे लिए पूजा की तरह है।”
बीमार और बुजुर्ग लोगों की देखभाल में भी वह समय देते हैं। “जब मैं किसी की मदद करता हूं, तो मुझे बहुत संतुष्टि मिलती है,” शिबू ने कहा। “यह पैसे से नहीं खरीदी जा सकती।”
अन्य धर्मों के प्रति सम्मान – प्रेम का पाठ
दिलचस्प बात यह है कि धर्म परिवर्तन के बाद भी शिबू दूसरे धर्मों का सम्मान करते हैं।
“मैंने इस्लाम छोड़ा है, लेकिन मैं इस्लाम का अपमान नहीं करता,” उन्होंने स्पष्ट किया। “हर धर्म भगवान तक पहुंचने का एक रास्ता है। मुझे अपना रास्ता मिल गया, लेकिन दूसरों का रास्ता भी सही है।”
वह आज भी अपने मुस्लिम दोस्तों से मिलते हैं। ईद पर उन्हें बधाई देते हैं। मस्जिद के सामने से गुजरते समय सम्मान से सिर झुकाते हैं।
“कृष्ण ने मुझे प्रेम सिखाया है, नफरत नहीं,” शिबू ने कहा। “मैं हर धर्म, हर इंसान से प्यार करता हूं। यही असली भक्ति है।”
उनका मानना है कि भगवान एक है, बस नाम अलग हैं। “अल्लाह हो या भगवान, राम हो या रहीम, सब एक ही हैं,” उन्होंने कहा।
भविष्य की योजनाएं – जीवन का लक्ष्य
शिबू के जीवन में अब एक स्पष्ट लक्ष्य है।
“मैं पूरी जिंदगी कृष्ण की भक्ति में लगाना चाहता हूं,” उन्होंने कहा। “मेरा सपना है कि एक दिन मैं वृंदावन में रहूं और वहीं अपनी आखिरी सांस लूं।”
वह कृष्ण भक्ति का प्रचार करना चाहते हैं। लोगों को गीता का ज्ञान देना चाहते हैं। “जो शांति मुझे मिली है, वह सबको मिलनी चाहिए,” उन्होंने कहा।
शिबू की योजना है कि वह भगवद गीता पर एक किताब लिखें जो आम लोगों की भाषा में हो। “गीता हर किसी के लिए है, सिर्फ विद्वानों के लिए नहीं,” उन्होंने कहा।
वह युवाओं को भी आध्यात्मिकता की ओर आकर्षित करना चाहते हैं। “आजकल के युवा भटक रहे हैं,” शिबू ने कहा। “उन्हें एक दिशा चाहिए, एक उद्देश्य चाहिए। कृष्ण भक्ति उन्हें वह दे सकती है।”

आध्यात्मिक विकास – लगातार सीखने की यात्रा
शिबू मानते हैं कि आध्यात्मिक यात्रा कभी खत्म नहीं होती।
“हर दिन कुछ नया सीखने को मिलता है,” उन्होंने कहा। “गीता को पढ़ते हुए हर बार कुछ नया समझ आता है। यह अनंत ज्ञान का सागर है।”
वह नियमित रूप से आध्यात्मिक किताबें पढ़ते हैं। स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, चैतन्य महाप्रभु – इन सबकी जीवनियां और शिक्षाएं उन्हें प्रेरित करती हैं।
“मैं अभी भी सीख रहा हूं,” शिबू ने विनम्रता से कहा। “भक्ति का कोई अंत नहीं है। जितना गहरे जाओ, उतना और गहरा मिलता है।”
उन्होंने अपने गुरु से वेद और उपनिषद पढ़ना भी शुरू किया है। “यह बहुत गहरा ज्ञान है,” उन्होंने कहा। “लेकिन मैं धीरे-धीरे समझ रहा हूं।”
संदेश – दूसरों के लिए प्रेरणा
शिबू अपनी कहानी से दूसरों को क्या संदेश देना चाहते हैं?
“सबसे पहली बात – अपने दिल की सुनो,” उन्होंने कहा। “समाज क्या कहेगा, लोग क्या सोचेंगे, यह मत सोचो। अपनी आत्मा की आवाज सुनो।”
“दूसरी बात – सच्ची खोज करो। किसी भी चीज को आंख बंद करके मत मान लो। सवाल पूछो, खोजो, समझो। तब जो सही लगे, उस पर चलो।”
“तीसरी बात – प्रेम से जियो। चाहे कोई भी धर्म हो, अगर प्रेम नहीं है तो सब बेकार है। सबसे प्यार करो, सबका सम्मान करो।”
शिबू उन लोगों से भी कहना चाहते हैं जो धर्म परिवर्तन की सोच रहे हैं।
“यह बहुत बड़ा फैसला है,” उन्होंने चेतावनी दी। “जल्दबाजी मत करो। पहले खुद को अच्छे से समझो। अपने परिवार की भी सोचो। यह रास्ता आसान नहीं है।”
“लेकिन अगर तुम्हें सच में लगता है कि यही तुम्हारा रास्ता है, तो डरो मत। भगवान तुम्हारे साथ हैं।”
एक अधूरी लेकिन प्रेरक यात्रा
मोहम्मद जावेद से शिबू कृष्ण दासी बनने की यात्रा सिर्फ एक धर्म परिवर्तन की कहानी नहीं है। यह आत्म-खोज, विश्वास और साहस की कहानी है।
यह कहानी हमें सिखाती है कि धर्म सिर्फ एक लेबल नहीं है। यह दिल की बात है, आत्मा का सवाल है। हर व्यक्ति को अपना रास्ता खुद खोजना होता है।
शिबू की यात्रा आसान नहीं थी। परिवार से दूरी, समाज का विरोध, अपनी पुरानी पहचान को छोड़ना – यह सब बहुत कठिन था। लेकिन उनका विश्वास उनकी ताकत बना।
आज शिबू एक संतुष्ट और शांत जीवन जी रहे हैं। कृष्ण भक्ति ने उन्हें वह सुकून दिया जो वह खोज रहे थे। उनका चेहरा एक अलग ही तेज से चमकता है।
“मुझे कोई अफसोस नहीं है,” शिबू ने मुस्कुराते हुए कहा। “मैंने जो फैसला लिया, वह मेरे लिए सही था। मैं खुश हूं, शांत हूं। और सबसे बड़ी बात – मुझे अपना रास्ता मिल गया है।”
उनकी कहानी अभी भी जारी है। आगे क्या होगा, यह तो समय ही बताएगा। लेकिन एक बात तय है – शिबू कृष्ण दासी ने अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जीने का साहस दिखाया। और यही शायद जीवन की सबसे बड़ी सीख है।
हर इंसान की अपनी यात्रा होती है। किसी को मंदिर में शांति मिलती है, तो किसी को मस्जिद में। किसी को गीता में जवाब मिलते हैं, तो किसी को कुरान में। असल बात यह नहीं है कि रास्ता कौन सा है, असल बात यह है कि रास्ता सच्चा हो, दिल से हो।
शिबू की कहानी हमें यही सिखाती है – अपने दिल की सुनो, सच की खोज करो और जो सही लगे, उस पर चलो। फिर चाहे दुनिया कुछ भी कहे।
लेखक का नोट: यह लेख धर्म परिवर्तन और आध्यात्मिक यात्रा की सामान्य समझ पर आधारित है। व्यक्तिगत अनुभवों को प्रामाणिक तरीके से प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। यह लेख किसी धर्म का प्रचार या किसी धर्म की आलोचना नहीं करता, बल्कि एक व्यक्ति की निजी आध्यात्मिक यात्रा को समझने का प्रयास है। हर व्यक्ति को अपने विश्वास को चुनने का संवैधानिक अधिकार है और इसका सम्मान होना चाहिए।




